Wednesday, January 14, 2009

WHO Deserves MORE?

यह फोटो मुझे मेरे एक मित्र की फॉरवर्ड मेल द्वारा प्राप्त हुआ।
इसे देखने के बाद मुझे लगा की इसे ब्लॉग में लगाया जाना चाहिये......इसलिये लगा दिया

मैं इस मेल को उसी तरह लगा रही हूं जैसे मुझे मिली थी इसलिये मैंने अंग्रेजी को हिन्दी में बदलने की कोई कोशिश नहीं की।


आप को कैसी लगी ये हकीकत---------


The India cricket team bus.


& DON'T MISS the VIJAY RATH


Now lets have a look at the luxury of our commandos
after their 60 hrs sleepless battle!!!

The Black Cat (NSG) commando bus after operation at TAJ .




WHICH VICTORY WAS CRITICAL ??
What a shame and disgrace to every citizen of India that the elite NSG
Force was transported into ordinary BEST buses,

whereas our cricketers are transported into state of the art
luxury buses,

these Jawans lay down their lives to protect every
Indian and these cricketers get paid even if they lose a match,

we worship these cricketers and forget the martyrdom of these brave Jawans.

The Jawans should be paid the salaries of the cricketers
and the cricketers should be paid the salaries of the Jawans.


Do not worry about those who have come thru boats....
Our forces can easily defeat them.
WORRY about those who have come thru votes....
Those are our REAL ENEMIES…

19 comments:

Abhishek said...

शर्मनाक. सिर्फ़ इतना ही कह सकता हूँ कि It can happens only in India.

seema gupta said...

" any thing can happen in india, really painful.."

regards

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत दुखद है. इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या होगा? पर ये हमेशा का रोना है.शायद वीर पुरुष रफ़ - टफ़ ही ज्यादा आराम महसुस करते हों. अगर उनको लक्जरी मे आनन्द आयेगा तो फ़िर वो हमारी रक्षा नही कर पायेंगे. उनको तो कडक फ़र्श और हाथों मे बंदूक ऊठाने मे ही लक्जरीयश मजा आता है, तभी तो आपके ये गौरव, राहुल और धोनी मोनी लक्जरी बसो मे मजे लेते हैं.

पर इन कमांडोज को उचित सम्मान भी दिया जाना चाहिये. पर वक्त के साथ २ इनको भुला दिया जाता है और धोनी मोनी अमर हो जाते हैं. क्या कहा जाये?

रामराम.

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर said...

बहुत दुखद है. इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या होगा?

P.N. Subramanian said...

हमारे कोम्मोंडोस के त्याग का गुणगान इस तरह कुछ दिनों तक हम लोग करते रहेंगे फ़िर भुला देंगे.`यही उनकी नियति है.

Zakir Ali Rajnish (TSALIIM) said...

शायद यही हमारे देश का दुर्भाग्‍य है।

डॉ .अनुराग said...

तस्वीरे अधूरी है...अगर पूरी मिलेगी तो आप निराशा ओर उदासी में डूब जायेगी....

मुसाफिर जाट said...

विनीता जी नमस्कार
बढ़िया तस्वीरे है. दिल को छू गयी. हमारे जाम्बाजो को ऐसी बसों का मजा नहीं लेना है.

Raushni said...

dardnaak hakikat

विनय said...

मकर संक्रान्ति की शुभकामनाएँ
मेरे तकनीकि ब्लॉग पर आप सादर आमंत्रित हैं

-----नयी प्रविष्टि
आपके ब्लॉग का अपना SMS चैनल बनायें
तकनीक दृष्टा/Tech Prevue

Mired Mirage said...

इस पर क्या कहा जा सकता है ?
संक्रान्ति की शुभकामनाएँ। काले कउवा मना रही हैं क्या?
घुघूती बासूती

Arun said...

Afasosjank baat hai....
lakin mai dr. Anuraag se sahmat hu ki ye to adhuri tasvir hai.... puri tasvir dekhogi to aur zyada bura lagega.....

Vijay Kumar said...

यही देखकर इन रण बांकुरों को नमन करने का मन करता है .आपने जिस बारीकी से इसे प्रस्तुत किया है उसके लिए बधाई. इन्ही वीर्रों के लिए एक गीत लिखा है मैंने अपने ब्लॉग पर ,वक्त हो तो गौर करियेगा

प्रकाश गोविन्द said...

हमारे एन एस जी के कमांडो दुनिया के सर्वश्रेष्ठ कमांडोज में गिने जाते हैं ! इजरायल, अमेरिका, रूस, फ्रांस के साथ भारत के एन एस जी कमांडो की गिनती होती है ! यह अपने आप में बहुत गौरवपूर्ण बात है !
आज तक हमारे कमांडो किसी भी मिशन में फेल नहीं हुए ! इनकी डिक्शनरी में असफलता जैसा शब्द नही होता ! इनका एक महत्वपूर्ण नारा भी होता है - " आल इन वन, वन इन आल" !

लक्सरी बसों में बैठे लोगों के चेहरों की मुस्कराहट इन कमांडो की वजह से ही कायम है !
एक सामान्य सिपाही अपने बीस साल के सर्विस में जितनी ट्रेनिंग का सामना करता है उससे पचास गुना ज्यादा इन कमांडो को एक साल में करना होता है ! इस दौरान इनके अन्दर देश भक्ति, अनुशासन और कर्तव्य की ऐसी भावना भर दी जाती है कि यह मान - सम्मान - पुरस्कार - जैसी चीजों से ऊपर उठ चुके होते हैं ! ये आराम - सुख सुविधा के तलबगार नहीं हैं ! ये कष्ट सहते हैं , तभी देश शुकून से रहता है ! इनका हर मैच फाईनल मैच ही होता है ...... दूसरी ईनिंग का मौका नहीं होता ! ऐसे जांबाज कमांडो की तुलना लक्सरी बस में बैठे लोगों के साथ करना नादानी होगी !

जाने क्यूँ फिल्म "हकीकत" का गाना याद
आ रहा है :
जिन्दा रहने के मौसम बहुत हैं मगर
जान देने की ऋतु रोज आती नहीं .....

Amit said...

shame on us...

hem pandey said...

आपने ये फोटो उपलब्ध कराये और इसकारण प्रकाश गोविन्द की सटीक टिप्पणि पढने को मिली.
धन्यवाद.

BrijmohanShrivastava said...

आपको जो फोटो प्राप्त हुए उन्हें आपने ब्लॉग पर लगा कर हमें लाभंबित किया /अंग्रेजी को हिन्दी में बदलने की जरूरत न समझी यह भी अच्छा है /अन्तिम चार पंक्तिया जो बोल्ड अक्षर में लिखी है जिसने भी लिखी हों उसके चरण स्पर्श को जी चाहता है /मैंने नोट करली हैं /ये पंक्तिया ऐसी है कि प्रत्येक लेख आरम्भ करने के पूर्व लिखी ही जानी चाहिए जैसे किसी कथा को प्रारम्भ करने के पूर्व श्लोक लिखा जाता है

Harsh pandey said...

desh me kuch bhee sambhav hai

आनंदकृष्ण said...

आपका ब्लॉग देखा बहुत अच्छा लगा.... मेरी कामना है कि आपके शब्दों को नए अर्थ, नए रूप और विराट संप्रेषण मिलें जिससे वे जन-सरोकारों के समर्थ सार्थवाह बन सकें.......

कभी फुर्सत में मेरे ब्लॉग पर भी पधारें...
http://www.hindi-nikash.blogspot.com

सादर- आनंदकृष्ण, जबलपुर