Tuesday, October 13, 2009

मेरी पूर्णगिरी यात्रा - २



पूर्णगिरी जाने के लिये पहले टनकपुर जाना होता है। जहां हम लोगों ने रात को रुकने का प्लान किया था इसलिये कुमाऊँ मंडल विकास निगम के रैस्ट हाउस में बुकिंग करवाई थी। टनकपुर पहुंचते हुए काफी देर हो गयी थी और सर्दियों के दिन थे इसलिये कोहर भी गहराने लगा था। कुछ देर रैस्ट हाउस में बिताने के बाद हम लोग खाने की तलाश में बाजार की तरफ निकल आये। टनकपुर न तो बहुत बड़ा शहर है और न ही बहुत छोटा। यहां से नेपाल भी जाते हैं इसलिये कहा जा सकता है कि यह नेपाल और भारत के बॉर्डर वाला शहर है। यहां काफी तरह के सामान आसानी से मिल जाती हैं जिनमें इलेक्ट्रॉनिक सामान मुख्य हैं।

खाना खाने के लिये हमें एक ढाबा मिल गया। ढाबे वाले ने बोला कि उसे खाना तैयार करने में थोडा समय लगेगा क्योंकि वह खाना पहले से बना के नहीं रखता। खाना बनने तक वो हमारी टेबल में कुछ हरी मिर्च और एक-एक गिलास पानी का रख गया। हमें लगा कि यहां शायद खाने से पहले मिर्च का सलाद ही खाया जाता हो। खैर पानी और मिर्च दोनों ही वैसी की वैसी मेज में पड़ी रही। करीब आधे घंटे में वो हमारे लिये खाना लेकर आया और क्या खूब खाना लाया। हम तो बस उसकी तारीफ ही करते रहे। दिनभर की थकावट के बाद रात को ऐसा खाना नसीब होने पर हम लोग अपने को धन्य समझ रहे थे। खाना निपटाने के बाद हम वहां से लौट लिये और रास्ते से मूंगफली खरीदी। ऐसा कहा जाता है कि टनकपुर की मूंगफली बहुत ही अच्छी किस्म की होती है जो कि मूंगफली खाने पर महसूस भी हुआ।

दूसरे दिन सुबह ही हम लोग पूर्णागिरी के लिये चले गये। टनकपुर से पूर्णागिरी पहले तो पैदल ही जाते थे पर अब सड़क बन चुकी है। पर सड़क क्या है खतरनाक है। टुन्यास तक बनी ये सड़क बिल्कुल कच्ची और उबड़-खाबड़ है जिसमें हमलोग सिर्फ अगल-बगल गिरते पड़ते ही रहे। कई जगह तो ऐसा भी था कि गाड़ी जरा सा भी इधर-उधर हुई तो सीधे नीचे ही लुढ़केगी। इस रास्ते से कहीं कहीं शारदा नदी जिसे काली नदी भी कहते हैं दिख रही थी। करीब 2 ढाई घंटे में हम लोग टुन्यास पहुंच गये थे। यहां से आगे का रास्ता तो पैदल ही तय करना था। इसलिये थोड़ा सुस्ताने के बाद हम आगे बढ़ गये।
 

इस रास्ते में दोनों तरफ दुकानें, ढाबे और छोटे-छोटे मंदिर हैं जिस कारण इधर-उधर कुछ भी नहीं देखा जा सकता है बस सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ते जाओ। इन रास्तों में रात को रुकने के लिये धर्मशालायें भी बनी हुई है और शौचालय आदि की व्यवस्था भी है पर इसका निकासी का तरीका थोड़ा अटपटा सा लगा और गंदगी तो क्या कहने जितने तरह का कूढ़ा हो सकता था सब यहां मौजूद था। हममें से दो तीन लोगों की चलने की अच्छी प्रेक्टिस थी सो हमें चलने में परेशानी नहीं हुई पर भाईसाब, भाभी और उनकी बेटी को चलने में परेशानी हो रही थी जिस कारण हमें भी धीरे-धीरे चलना पड़ रहा था। धीरे-धीरे चलने से पैरों में दर्द सा होने लगता है पर साथ में थे तो और कुछ कर भी नहीं सकते थे।


 करीब 3 घंटे चलने के बाद हम लोग उस स्थान में पहुंच गये जहां से पूर्णागिरी मां का दरबार शुरू होता है। पूर्णागिरी के बारे में मान्यता है कि शिव जब सती के मृत शरीर को ले जा रहे थे उस समय सती की नाभी इस स्थान में गिरी थी। इसके आगे भी काफी पैदल चलना होता है पर यहां जूता चप्पल ले जाना मना है। हमने यहीं एक दुकान से पूजा का सामान खरीदा, वहीं जूते चप्पल रखवा दिये और मंदिर की ओर निकल गये। इस रास्ते को दो भागों में बांटा गया है। एक आने के लिये दूसरा जाने के लिये। हालांकि यह रास्ता सींमेंट से बनाया है पर पता नहीं क्यों इसमें कंकड़ बिछाये हैं जो पैरों में चुभते हैं पर ज्यादा परेशान नहीं करते। यहां से इधर-उधर का इलाका भी देखा जा सकता है पर इस रास्ते से कहीं भी शारदा नदी नजर नहीं आयी।


जब हम मंदिर के नजदीक पहुंचे तो मंदिर के पीछे वाली पहाड़ी में कूढ़े का ढेर देख कर दंग रह गये। समझ नहीं आया कि आखिर लोग सफाई क्यों नहीं करते। मंदिर में थोड़ी भीड़ थी पर नंबर जल्दी आ गया। जैसे ही हम पंडित के सामने गये उसने बाजार की जैसी बोली लगानी शुरू कर दी। 1001 का, 501 का या 101 का पाठ। उससे कम में किसी की पूजा नहीं होगी। मुझे कुछ समझ ही नहीं आया कि ये क्या तमाशा है। भगवान तो श्रृद्धा से खुश हो जाते हैं पर ये पंडित...। जो लोग 101 रुपय से कम दक्षिणा चढ़ा रहे थे उन्हें तो पुजारी देख भी नहीं रहे थे। इतनी आस्था और विश्वास के साथ लोग यहां आते हैं पर इन पुजारियों के व्यवहार के कारण उन्हें कितना अपमानित होना पड़ता है। मैंने तो पूजा करने से ही मना कर दिया पर साथ वालों ने पूजा करवायी थी इसलिये पंडित मुझे कुछ नहीं कह पाया। दर्शन करने के बाद मन और ज्यादा बेचैन हो उठा था। मंदिर से बाहर निकलने पर जिसने मन को शांत किया वो था मंदिर से शारदा नदी का विहंगम दृश्य। बिल्कुल सांप की तरह बहती हुई शारदा बहुत अच्छी लग रही थी पर क्योंकि हल्की सी परत कोहरे की अभी भी छाई हुई थी इसलिये बहुत साफ नजारा नहीं दिखाई दिया पर इस दृश्य ने सारे गुस्से को जैसे अपने में सोख लिया।



जारी....

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