Friday, April 9, 2010

उत्तराखंड की लोक संस्कृति है जागर

कुमाउंनी संस्कृति के विविध रंग हैं जिनमें से एक है यहां की ‘जागर’। उत्तराखंड में ग्वेल, गंगानाथ, हरू, सैम, भोलानाथ, कलविष्ट आदि लोक देवता हैं और जब पूजा के रूप में इन देवताओं की गाथाओं का गान किया जाता है उसे जागर कहते हैं। जागर का अर्थ है ‘जगाने वाला’ और जिस व्यक्ति द्वारा इन देवताओं की शक्तियों को जगाया जाता है उसे ‘जगरिया’ कहते हैं। इसी जगरिये के द्वारा ईश्वरीय बोल बोले जाते हैं। जागर उस व्यक्ति के घर पर करते हैं जो किसी देवी-देवता के लिये जागर करवा रहा हो।

जागर में सबसे ज्यादा जरूरी होता है जगरिया। जगरिया को ही हुड़का और ढोलक आदि वाद्य यंत्रों की सहायता से देवताओं का आह्वान करना होता है। जगरिया देवताओं का आह्वान किसी व्यक्ति विशेष के शरीर में करता है। जगरिये को गुरू गोरखनाथ का प्रतिनिधि माना जाता है। जगरिये अपनी सहायता के लिये दो-तीन लोगों को और रखते हैं। जो कांसे की थाली को लकड़ियों की सहायता से बजाता है। इसे ‘भग्यार’ कहा जाता है।

जागर में देवताओं का आह्वान करके उन्हें जिनके शरीर में बुलाया जाता है उन्हें ‘डंगरिया’ कहते हैं। ढंगरिये स्त्री और पुरूष दोनों हो सकते हैं। देवता के आह्वान के बाद उन्हें उनके स्थान पर बैठने को कहा जाता है और फिर उनकी आरती उतारी जाती है। जिस स्थान पर जागर होनी होती है उसे भी झाड़-पोछ के साफ किया जाता है। जगरियों और भग्यारों को भी भी डंगरिये के निकट ही बैठाया जाता है।

जागर का आरंभ पंच नाम देवों की आरती द्वारा किया जाता है। शाम के समय जागर में महाभारत का कोई भी आख्यान प्रस्तुत किया जाता है और उसके बाद जिन देवी-देवताओं का आह्वान करना होता है उनकी गाथायें जगरियों द्वारा गायी जाती हैं। जगरिये के गायन से डंगरिये का शरीर धीरे-धीरे झूमने लगता हैं। जागर भी अपने स्वरों को बढ़ाने लगता है और इसी क्षण डंगरिये के शरीर में देवी-देवता आ जाते हैं। जगरिये द्वारा फिर से इन देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। अब डंगरिये नाचने लगते हैं और नाचते-नाचते अपने आसन में बैठ जाते हैं। डंगरिया जगरिये को भी प्रणाम करता है। डंगरिये के समीप चाल के दाने रख दिये जाते हैं जिन्हें हाथों में लेकर डंगरिये भूतकाल, भविष्यकाल और वर्तमान के विषय में सभी बातें बताने लगते हैं।

डंगरिये से सवाल पूछने का काम उस घर के व्यक्ति करते हैं जिस घर में जागर लगायी जाती है। बाहरी व्यक्ति भी अपने सवाल इन डंगरियों से पूछते हैं। डंगरिये द्वारा सभी सवालों के जवाब दिये जाते हैं और यदि घर में किसी तरह का कष्ट है तो उसके निवारण का तरीका भी डंगरिये द्वारा ही बताया जाता है। जागर के अंत में जगरिया इन डंगरियों को कैलाश पर्वत की तरफ प्रस्थान करने को कहता है। और डंगरिया धीरे-धीरे नाचना बंद कर देता है।

जागर का आयोजन ज्यादातर चैत्र, आसाढ़, मार्गशीर्ष महीनों में किया जाता है। जागर एक, तीन और पांच रात्रि तक चलती है। सामुहिक रूप से करने पर जागर 22 दिन तक चलती है जिसे ‘बाईसी’ कहा जाता है।

वैसे तो आधुनिक युग के अनुसार इन सबको अंधविश्वास ही कहा जायेगा। पर ग्रामीण इलाकों में यह परम्परा आज भी जीवित है और लोगों का मानना है कि जागर लगाने से बहुत से लोगों के कष्ट दूर हुए हैं। उन लोगों के इस अटूट विश्वास को देखते हुए इन परम्पराओं पर विश्वास करने का मन तो होता ही है।

14 comments:

KAVITA RAWAT said...

Bahut sundar prastuti... Jaagar lok sanskriti aur lok jagriti bhi kahi jaa sakti hai.. iske madhyam se kam se we log jo Garhwal kabhi kabhi hi jaate hai ise bahane sabse mel mulakaat bhi kar lete hai..
Padhkar Bahut achhi lagi aapki yah post..
Bahut haardik shubhkamnayne..
Sarhaniya prayas...

Amitraghat said...

बहुत उपयोगी पोस्ट और लोक संस्कृति को पूरे देश में फैलाने का अनुपम प्रयास..........."

रंजना [रंजू भाटिया] said...

रोचक लगी यह पोस्ट

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) said...

purani paramparaon ko kabhi andhvishwas ka naam nahi diya ja sakta.. unka apna sanskritik mahatv hota hai.. aapkee post se aisee hi samriddha paramapra se rubru huye..

Happy Blogging

डॉ. मनोज मिश्र said...

बहुत रोचक.

मुनीश ( munish ) said...

"nice", before anyone else uses this term as copyright !
Very informative indeed.

Manish Kumar said...

शुक्रिया इस जानकारी के लिए..

baddimag said...

Uttarakhand ki jagar ko abhasi duniya se parichit karane ke liye abhar......aur bhi parampraon ko sadhenge yahi ummeed hai

Hem Pant said...

विनीता जी जागर के बारे में आपने बहुत सुन्दर जानकारी दी है. कुछ इसी तरह का प्रयास हमने अपने फोरम पर भी किया है जिसमें जागर से सम्बन्धित कुछ तस्वीरें और "जागर के बोल" भी हैं.

कृपया एक नजर डालें-

http://www.merapahad.com/forum/culture-of-uttarakhand/jagar-calling-of-god-from-uttarakhand/15/

विनीता यशस्वी said...

Hem ji maine apka diya hua link dekha...jagar ke baare mai sach mai kafi achhi aur detail jankari MERE PAHAD mai upalbdha hai...

ARJUN BINJOLA said...

BAHUT SAHI JANKARI DI AHI JANKARI K LIYE BAHUT BAHUT SHUKRIYA....
JAGAR GARHWAL KI AATMA HAI AUR ESE KHATM NAHI HONE DENA CHAHIYE....

Bharat Singh said...

JO LOG JAGAR KO ANDHVISHWAS KAHTE HE UNK LIYE KOE V BHAGWAN MANYE NI RKHTA KYO KI YH V BHAGWAN KI HI AK GUNGAN KARNE KA ,PUJNE KA ,UNHE YAD KARNE KA ,BHAKI KA TARIKA HE.
PUJA KISI V ROOP ME HO SAKTI HE CHAE MANDIR ME HO ,YA MASJID ME HO ,YA JAGAR K DWARA GHAR ME..........

gopu said...

bahut achha laga. aapka ye post.

Surendra Prasad said...

BHAUT BHAUL KOSHISH CHHU EJA TUM JEE RAIYA BACHH RAIYA .RAJESHWARI A I R RAMPUR