Monday, April 5, 2010

क्या यही है हिन्दी प्रेम ???

वैसे तो ब्लॉग जगत में फालतू और बकवास पोस्टों पर टिप्पणियों के ढेर लग जाना और उन्हें एक बहुत बड़ा बहस का मुद्दा बना देना होता रहता है, पर अफसोस तब होता है जब कि सच में एक बहुत बड़ा विषय जो हमारे देश, हमारी भाषा, हमारे सम्मान से जुड़ा हो उसके बारे में बात की जाती है तो कोई उस पर ध्यान भी नहीं देता।

अभी कुछ दिन पहले ही रोजनामचा ब्लॉग मैं मैंने एक पोस्ट पड़ी थी। इतना गंभीर और सनसनीखेज विषय होने के बाद भी उस पर लोगों ने अपनी राय तक देने की कोशिश नहीं कि तो इसे क्या कहा जायेगा ???

यह पूरी पोस्ट मैंने रोजनामचा ब्लॉग से ही उठायी है।


आज के दौडते भागते युग में देश के बारे में बच्चों और युवा होती पीढी का सामान्य ज्ञान काफी हद तक कमजोर माना जा सकता है। देश में कितने राज्य और उनकी राजधानियों के बारे में सत्तर फीसदी लोगों को पूरी जानकारी न हो तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। किस सूबे की आधिकारिक भाषा क्या है, इस बात की जानकारी युवाओं को तो छोडिए भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मन्त्रालय के आला अधिकारियों को भी नहीं है।

सिक्किम भारत देश का हिस्सा है। चीन भी इस बात तो स्वीकार कर चुका है, कि सिक्किम भारत गणराज्य का ही एक अंग है। भारत गणराज्य के सूचना प्रसारण मन्त्रालय और प्रसार भारती के अधीन काम करने वाला ऑल इण्डिया रेडियो (एआईआर) इस राय से इत्तेफाक रखता दिखाई नहीं देता है। एआईआर की विदेश प्रसारण सेवा में  नेपाली को आज भी विदेशी भाषा का दर्जा दिया गया है, जबकि सिक्किम की आधिकारिक भाषा नेपाली ही है। इतना ही नहीं 1992 में संविधान की आठवीं अनुसूची में नेपाली को शामिल किया जा चुका है। एआईआर की हिम्मत तो देखिए इसकी अनदेखी कर एक तरह से एआईआर द्वारा संविधान की ही उपेक्षा की जा रही है।

भारत गणराज्य के गणतन्त्र की स्थापना के साथ ही 1950 में तत्कालीन प्रधानमन्त्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू के कार्यकाल में विदेशों में कल्चर प्रोपोगण्डा करने की गरज से विदेश प्रसारण सेवा का श्रीगणेश किया गया था। इस सेवा का कूटनीतिक महत्व भी होता था, इसमें विदेश प्रसारण सेवा के तहत वहां बोली जाने वाली भाषा में प्रोग्राम का प्रसारण किया जाता था। एआईआर ने वहां की भाषा के जानकारों की अलग से नियुक्ति की थी।

मजे की बात तो यह है कि विदेश प्रसारण सेवा में के दिल्ली स्थित कार्यालय में अनुवादकों - उद्घोषकों के वेतन भत्ते और सेवा शर्तें अनकी भाषा के हिसाब से तय होते हैं न कि उनकी वरिष्ठता अथवा योग्यता से। मसलन एक दसवीं पास व्यक्ति  जिसकी मात्र भाषा फ्रेंच है (जो पांडिचेरी की आधिकारिक राजभाषा है) को एक हिन्दी भाषी ग्रेजुएट से काफी अधिक वेतन व सुविधायें पाने की अधिकार है। 50 के दशक में जिन देशों को विदेश प्रसारण सेवा के लिए चिन्हित किया था, उनमें पाकिस्तान, अफगानिस्तान, आस्ट्रेलिया, ईस्ट और वेस्ट आफ्रीका, न्यूजीलेण्ड, मारीशस, ब्रिटेन, ईस्ट और वेस्ट यूरोप, नार्थ ईस्ट, ईस्ट एण्ड साउथ ईस्ट एशिया, श्रीलंका, म्यामांर, बंग्लादेश आदि शामिल थे।

एआईआर द्वारा नेपाली भाषा को विदेशी भाषा का दर्जा दिए जाने के बावजूद भी अनियमित (केजुअल) अनुवादक और उद्घोषकों को भारतीय भाषा के अनुरूप भुगतान किया जा रहा है, जो समझ से परे ही है। बताते हैं कि कुछ समय पहले केजुअल अनुवादक और उद्घोषकों द्वारा भुगतान लेने से इंकार कर दिया गया था। बाद में समझाईश के बाद मामला शान्त हो सका था।

उधर पडोसी मुल्क नेपाल जहां की आधिकारिक भाषा नेपाली ही है, ने भारत के ऑल इण्डिया रेडियो के इस तरह के कदम पर एआईआर के मुंह पर एक जबर्दस्त तमाचा जड दिया है। नेपाल में उपराष्ट्रपति पद की शपथ परमानन्द झा द्वारा हिन्दी में लेकर एक नजीर पेश कर दी। इतना ही नहीं नेपाल सरकार ने एक असाधारण विधेयक पेश कर लोगों को चौंका दिया है। इस विधेयक में देश के महामहिम राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद की शपथ मातृभाषा में लिए जाने का प्रस्ताव दिया गया था।

अब सवाल यह उठता है कि 1992 में आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने के 18 साल बाद भी इस मामले को लंबित कर लापरवाही क्यों बरती जा रही है। यह अकेला एेसा मामला नहीं है, जबकि हिन्दी को मुंह की खानी पडी हो। वैसे भी हिन्दी देश की भाषा है। लोगों के दिलोदिमाग में बसे महात्मा गांधी, पहले प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरू से लेकर आज तक के निजाम हिन्दी को प्रमोट करने के नारे लगाते आए हैं, पर हिन्दी अपनी दुर्दशा पर आज भी आंसू बहाने पर मजबूर है।

लोग कहते हैं कि दिल्ली हिन्दी नहीं अंग्रेजी में कही गई बात ही सुनती है। हिन्दी सहित भारतीय भाषाओं के प्रोत्साहन के लिए अब तक करोडों अरबो रूपए खर्च किए जा चुके हैं, दूसरी ओर सरकारी तन्त्र द्वारा हिन्दी को ही हाशिए पर लाने से नहीं चूका जाता है। हिन्दी भाषी राज्यों में ही हिन्दी की कमर पूरी तरह टूट चुकी है। ईएसडी के प्रोग्राम में प्रेस रिव्यूृृ नाम का प्रोग्राम होता है। इसमें भारतीय अखबारों में छपी खबरों और संपादकीय का जिकर किया जाता है। विडम्बना देखिए कि इसमें हिन्दी में छपे अखबरों को शामिल नहीं किया जाता है। यद्यपि एेसा कोई नियम नहीं है कि इसमें सिर्फ आंग्ल भाषा में छपे अखबारों का ही उल्लेख किया जाए पर यह हिन्दुस्तान है मेरे भाई और यहां अफसरों की मुगलई चलती आई है, और आगे भी अफसरशाही के बेलगाम घोडे अनन्त गति से दौडते ही रहेंगे।

11 comments:

Amitraghat said...

सचमुच बेहद गंभीर मसला है......"

विजयप्रकाश said...

जाने कैसे कैसे लोग पदों को कुशोभित कर रहे हैं

डॉ. मनोज मिश्र said...

वैसे तो ब्लॉग जगत में फालतू और बकवास पोस्टों पर टिप्पणियों के ढेर लग जाना और उन्हें एक बहुत बड़ा बहस का मुद्दा बना देना होता रहता है, पर अफसोस तब होता है जब कि सच में एक बहुत बड़ा विषय जो हमारे देश, हमारी भाषा, हमारे सम्मान से जुड़ा हो उसके बारे में बात की जाती है तो कोई उस पर ध्यान भी नहीं देता।........
आप सही कह रही हैं,एक महत्त्वपूर्ण विषय पर आपनें लेखनी चलाई है,यह बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है .इसका समाधान होना ही चाहिए.

संगीता पुरी said...

आपने इस पोस्‍ट के बारे में चर्चा कर बहुत अच्‍छा किया .. इस प्रकार की उपेक्षा से हिंदी भाषा भाषियों की तरक्‍की कैसे हो सकती है ??

Arvind Mishra said...

आपने वाकई एक गंभीर मुद्दे को उठाया है

नवीन जोशी said...

सचमुच विचारणीय !!

अजय कुमार झा said...

विनीता जी इसमें कोई शक नहीं कि ये बहुत ही गंभीर मुद्दा है और इसे हल्के में नहीं लिया जान चाहिए , मैं इस दिशा में काम शुरू कर चुका हूं । इसके लिए आवश्यक जानकारी और सामग्री जुटते ही प्रिंट के साथ साथ ..बात ऊपर तक पहुंचाई जाएगी । और हां आगे की कुछ पोस्टें इस सिलसिले को बढाएंगी । मैं देखता हूं कि क्या क्या किया जा सकता है । आपका आभार इसे उठाने के लिए
अजय कुमार झा

namnam said...

वाकई शर्मनाक ! दिनांक २२ दिसंबर के नवभारत टाइम्स (नई दिल्ली) में ये मामला छपा था मगर आज भी आल इंडिया रेडियो के इस विभाग की बेहयाई जारी है . ये विभाग तनख्वाह का निर्धारण "भाषा'' के आधार पर ही करता है और अरबी ,फ़ारसी जैसी विदेशी ही नहीं बल्कि नेपाली जैसी स्वदेशी भाषा के मुकाबले भी भारतीय भाषा कर्मियों को सामान कार्य के लिए कम वेतन देकर अपमानित करता है . इस नीच मनोवृत्ति की निंदा जितनी की जाय ,कम है !

Udan Tashtari said...

आभार इस पोस्ट को यहाँ लाने का.

मुनीश ( munish ) said...

हिंदी - भाषियों के गाल पर करारा थप्पड़ . भारत में हिंदी का अपमान अब मुंबई और असम तक सीमित नहीं !

Shah Nawaz said...

बहुत ही सटीक लेख है. आज हमें ज़रूरत है, अपनी भाषा के महत्त्व को समझने की. दुनिया की कोई भी कौम अपनी संस्कृति को छोड़ कर तरक्की नहीं कर सकती है. पर अफ़सोस आजकल के नौजवान अंग्रेजी जैसी भाषाओँ को अपनी महान भाषा "हिंदी" पर महत्त्व देते हैं. आज आवश्यकता है "हिंदी" को कार्यालयी भाषा बनने की.



इस विषय पर मेर लेख:
[b]क्या हमारी महान मातृभाषा "हिन्दी" रोज़गार के अवसरों में बाधक है?[/b]
http://premras.blogspot.com