Tuesday, December 15, 2009

मेरी दिल्ली यात्रा - 2

जैसे-तैसे हम लोग करीब 7.30-8 बजे दिल्ली पहुँचे। हमें जो लेने आये थे वो भी मिल गये थे। इस समय दिल्ली में मौसम बहुत खुशगवार लग रहा था। न तो ज्यादा गरम और न ही ज्यादा ठंडी। हम लोग एक ऑटो करके दिलशाद गार्डन की ओर चले गये। वहाँ से आगे मेट्रो से जाना था। मेट्रो में यात्रा करना सुखद अनुभव रहा। किसी ने एक ठीक ही कहा था कि - मेट्रो सेवा देख कर लगता है कि भारत सच में तरक्की कर रहा है। हम लोग काफी थक चुके थे और भूख भी लग रही थी इसलिये हमने मेट्रो स्टेशन में ही कॉफी और समोसे खा लिये और आगे चल दिये। मेट्रो के बाद फिर हम लोग अपनी गाड़ी से घर की ओर बढ़ गये जो चाणक्यपुरी में था। इस समय काफी रात हो चुकी थी पर फिर भी हमने संसद भवन की झलक तो देख ही ली बाहर से। रात को करीब 11.30 बजे हम घर पहुँचे। उस दिन इतना थक गये थे कि सबसे थोड़ी बहुत बात की और सो गये।

दूसरे दिन सुबह के समय 6.30 बजे हम लोग टहलने के लिये सड़क पर निकल आये। इस समय दिल्ली में हल्की सी धुंध की चादर फैली हुई थी और थोड़ी सी सर्दी थी पर नैनीताल के अपेक्षा ज्यादा ठंडी नहीं लगी इसलिये सड़क पर काफी दूर तक टहलने निकल आये। इससे पहले जो दिल्ली देखी थी वो तो हर समय भीड़-भाड़ और शोर शराबे वाली थी पर इस बार वाली दिल्ली बिल्कुल अलग थी। साफ-सुथरी और दूर-दूर तक अच्छी खासी हरियाली फैली हुई। वापस घर आकर हमने सबसे अच्छे से मुलाकत की और नाश्ता किया। जिस फंक्शन के लिये हम आये थे वो शाम को 7 बजे से था इसलिये आज का पूरा दिन हमें मिल गया जिसका इस्तेमाल हमने दिल्ली घूमने के लिये किया।

दिल्ली इतना बड़ा है कि एक दिन इसे देख पाना तो असंभव ही है इसलिये हमने टूअर एंड ट्रेवल्स सेवा का लाभ उठाया। हालांकि मुझे कभी भी इस तरह घूमना पसंद नहीं रहा है पर उस समय वहीं सबसे सही लगा क्योंकि एक दिन में इतनी जगहें देख पाना वैसे तो संभव न होता। हमने जिस ट्रेवल कम्पनी की सेवा ली थी उन्होंने बताया था कि वो हमें दिल्ली का पूरा दर्शन ही करवा देंगे और शाम को करीब 5.30 से 6 बजे के बीच वापस छोड़ देंगे। हमारा घर रास्ते में ही था इसलिये वो हमें वहीं से ले लेंगे और फिर वापसी में उसी स्थान पर छोड़ भी देंगे। आइडिया बुरा नहीं था इसलिये हम लोग तैयार हो गये और करीब 10 बजे घर से निकल गये।

चौड़ी-चौड़ी सड़कें जिनमें सीमित यातायात और चारों तरफ हरियाली। एम्बेसी की बड़े-बड़े ऑफिस, संसद भवन, राष्ट्रपति भवन और भी न जाने क्या-क्या भवन। हम लोग आपस में यही बात कर रहे थे कि यदि पूरी दिल्ली ही ऐसी हो जाये तो फिर कौन दिल्ली के नाम पे तौबा-तौबा करे। पर असल दिल्ली तो दूसरी ही है खैर गाइड ने बताया कि सबसे पहले हम लोग कुतुबमिनार देखने जायेंगे।


 

 

 

कुतुबमिनार एक बार बहुत पहले देखी थी जब मैं छोटी थी। उस समय कुछ समझ नहीं आया कि ये है क्या ? पर इस बार देखी तो बस देखते ही रहे। हमें यहाँ पर घूमने के लिये सिर्फ आधा घंटा ही दिया गया था। मेरे लिये बहुत कम था क्योंकि घूमुं या फोटो खिंचू। हम लोगों ने टिकट लिया और अंदर चले गये। यहाँ कई विदेशी सैलानी नज़र आये। हमने भी घूमना शुरू किया। कुतुबमिनार में कुल 378 सीढ़ियां हैं जिनकी मदद से सबसे ऊपर की मंजिल तक जाया जा सकता है पर अब यह बंद हो चुकी है। गाइड ने बताया कि सन् 1981 में हुए एक हादसे जिसमें करीब 45 बच्चों ने अपनी जान गवांई थी, के बाद इन्हें बंद कर दिया गया। कुतुबमिनार की ऊँचाई 72.5 मीटर (234 फीट) है और यह दुनिया की सबसे बड़ी मीनार है। कुतुबमिनार के सबसे नीचे वाली मंज़िल की चौड़ाई लगभग 14.3 मीटर है और सबसे ऊपर वाली मंजिल की चौड़ाई 2.75 मीटर है। इनकी दीवारों पर आयतें भी खुदी हैं

कुतुबमिनार के साथ कुछ और स्थान भी हैं जैसे ईमाम ज़ामिन का मकबरा, अलाई मिनार, अलाई दरवाज़ा, आइरन पिलर, मिस्जद आदि। पर जब समय की कमी हो तो ऐसी जगहों को अच्छे से नहीं देखा जा सकता था। इसलिये हम लोगों ने मिलकर यह सोच लिया था कि अगली बार जब भी आना होगा तो कुतुबमिनार को एक बार फिर फुर्सत से देखने आयेंगे। अलाई मिनार की ऊँचाई 24.5 मीटर है। यहाँ जो आइरन पिलर है उसकी ऊँचाई लगभग 7.21 मीटर है। ऐसा कहा जाता है कि इस आयरन पिलर को दोनों हाथों से पूरा पकड़ लेने पर सारी इच्छायें पूरी होती हैं पर गाइड ने हमें पहले ही बता दिया था कि - ऐसा सिर्फ अमिताभ बच्चन के लिये ही था उनकी फिल्म `चीनी कम या ज्यादा´ जो भी हो, के लिये। इसलिये आप लोग वहां नहीं जा सकते हैं। सो हम दूर से देख कर ही वापस आ गये। यहाँ पर इतना कुछ था देखने के लिये कि समय की कमी बहुत ज्यादा अखर रही थी। खैर जो भी हो पर यहाँ मुझे मेरा एक `फैलो ट्रेवलर´ मिल गया जो कि 5-6 साल का छोटा सा बच्चा था। मैं गिलहरियों की फोटो खींचने के लिये उन्हें कुछ खिला रही थी तो अचानक मेरे कंधे में एक नन्हा सा हाथ आया और मासूम सी आवाज़ में बोला - दीदी मैं भी िस्क्वरल को खाना खिलाऊँ मैंने पीछे देखा एक प्यारा सा बच्चा हाथ में एक चिप्स लेकर खड़ा था। उसके बाद वो पूरा समय मेरे साथ ही रहा और मुझे भी नये दोस्त का साथ अच्छा लगा क्योंकि उसने परेशान नहीं किया।


खैर कुछ देर बाद गाइड का इशारा आ गया वापस जाने का। यहाँ एक बार फिर आने की इच्छा के साथ हम लोग वापस आ गये। यहाँ से हमें लोटस टैम्पल या बहाई टैम्पल जाना था। बस में बच्चा मेरे साथ आकर ही बैठ गया। अब उसके मम्मी-पापा से भी हमारी पहचान हो गयी थी। बच्चा हमारे साथ ही बैठना चाहता था इसलिये हम लोगों ने उसे अपने साथ रख लिया। बच्चे की बातों के साथ और हमारी आपसी बातों के बीच हम लोग लोटस टैम्पल आ गये। यहाँ काफी भीड़ थी और मंदिर की भव्यता दूर से ही दिख रही थी। 



हमने इस जगह को सिर्फ बाहर से देखा क्योंकि अंदर जा कर प्रार्थना में बैठने का समय नहीं था। इस मंदिर को बहाई धर्म के लोगों ने बनवाया है। यह धर्म दुनिया के स्वतंत्र धर्मो में आधुनिकतम धर्म है। इसके संस्थापक बहाउल्लाह थे। यहाँ वैसे तो काफी शांति थी पर इस समय भीड़ थी इसलिये वो एकांत मंदिर के बाहर नहीं मिल सका पर यहाँ जाना अच्छा लगा। बच्चा अभी भी मेरा हाथ पकड़े था और पानी के छोटे -छोटे तालों के पास जाने के ज़िद कर रहा था। उसे हमने समझाया कि वहाँ नहीं जाते हैं तो वह समझ भी गया। बच्चे की यही बात अच्छी थी कि कुछ समझाने पर वह आराम से समझ रहा था और ज़िद करके परेशान नहीं कर रहा था। कुछ देर बाद हमें फिर गाइड का इशारा मिल गया और हम वापस आ गये।

इसके बाद हमारी अगली मंज़िल थी अक्षरधाम मंदिर। लगभग 100 एकड़ के क्षेत्र में बना यह एक विशाल मंदिर है हालांकि इतनी विशालता का कारण मुझे समझ नहीं आया पर इसका निर्माण था सुंदर। आजकल मुख्य मंदिर बंद था क्योंकि उसमें कुछ कार्य चल रहा था। इस मंदिर में सुरक्षा के खासे इंतज़ाम थे। यहाँ हमें सुरक्षा जांच करवाने में ही लगभग आधा घंटा लग गया। इसने हमें काफी कुछ सोचने पर मजबूर किया पर उस समय वो सब सोचने का कोई फायदा नहीं था। यहाँ तस्वीरें लेना बिल्कुल मना है। किसी भी तरह के इलेक्ट्रॉनिक वस्तुऐं ले जाना भी मना है यहाँ तक कि काला चश्मा पहनना भी मना है। इतने सख्त नियम शायद सही भी हों पर फिर भी ......। यहाँ हम एक द्वार से अंदर गये तो उसके बाद पूरा मंदिर देख कर ही आप दूसरे द्वार से बाहर आ सकते थे। क्योंकि यहाँ तस्वीरें लेना मना था इसलिये मंदिर प्रशासन ने अपनी तरफ से तस्वीरें खिंचवाने का इंतज़ाम किया था जहाँ कुछ विदेशी तस्वीरें खिंचवा भी रहे थे।

जारी...

17 comments:

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) December 15, 2009 12:39 PM  

Bahut Achcha likha aapne.. sabse zyada pasand hume aapka wo cute sa fellow traveler laga... waiting for next episode

Happy Blogging

रंजना [रंजू भाटिया] December 15, 2009 12:51 PM  

दिल्ली को आपकी नजर से देखना अच्छा लगा .खुद से रूबरू होने जैसा :)

अजय कुमार झा December 15, 2009 1:25 PM  

हमारी दिल्ली में आए वो मेहमान बनके ,
न मिले निकल गए , अनजान बनके ॥

बहुत नाइंसाफ़ी है जी ....हम बहुत नाराज हैं आपसे जाईये कुट्टी ....नहीं नहीं .....अबके तो कुट्टा करना पडेगा ....चलिए आप खूब घूमी फ़िरी ..हमे इसी बात की खुशी है

Arun December 15, 2009 2:06 PM  

Bahut achha yatra sansmaran hai. aage ki kisht ka intjar rahega.

Raushni December 15, 2009 4:10 PM  

bahut aacha raha abhi tak apka dilli safar. apka chhota sa fellow traveler sachmuch bahu cute hai

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक December 15, 2009 5:57 PM  

यायावरी की यह पोस्ट बढ़िया रही!
पोस्य पढ़कर हमने भी दिल्ली दर्शन कर लिए!

ताऊ रामपुरिया December 15, 2009 9:30 PM  

बहुत रोचक और सुंदर यात्रा वृतांत रहा ये. तस्वीरे बहुत जीवंत लगी. शुभकामनाएं.

रामराम.

लाहुली December 15, 2009 10:37 PM  

aapki Dehli yatra rochak hai. lage raheye. varshon baad dehli app ke saath goomna achha lag raha hai. agle episod ka intzaar hai!

vijay gaur/विजय गौड़ December 15, 2009 10:59 PM  
This comment has been removed by the author.
vijay gaur/विजय गौड़ December 15, 2009 11:02 PM  
This comment has been removed by the author.
Udan Tashtari December 16, 2009 12:59 AM  

बढ़िया रहा आपके अंदाज में दिल्ली घूमना!!

vijay gaur/विजय गौड़ December 16, 2009 7:54 AM  

बहुत आम और जानी पहचानी जगह को व्याख्यायित करना या उसका वर्णन कुछ इस अंदाज में करना, जो मौलिक भी लगे, सचमुच बड़ा कठिन काम है। लेकिन अपनी सहजता को बनाए रखते हुए सटीक अंदाजों में लिखा जा रहा यह यात्रा व्रतांत उस मौलिकता को प्रस्तुत कर रहा है विनीता।
"इसके बाद हमारी अगली मंज़िल थी अक्षरधाम मंदिर। लगभग 100 एकड़ के क्षेत्र में बना यह एक विशाल मंदिर है हालांकि इतनी विशालता का कारण मुझे समझ नहीं आया पर इसका निर्माण था सुंदर।"
लगातर आपके ब्लाग पर प्रकाशित होने वाले यात्रा व्रतांतों को पढ़ता रहा हूं, कह सकता हूं कि तुम महत्वपूर्ण यात्रा व्रतांत लिख रही हो। सबसे अच्छी बात यह है कि तुम्हारे लिखे हुए को पढ़ते हुए दिख रहा होता है रचनाकर एक महत्वपूर्ण रचना को रचते हुए भी सहज है, यानी इस मुगालते में वह खुद नहीं है कि जैसे वह कुछ महत्वपूर्ण रच रहा है। तुम्हारी यह सहजता ही छोटी छोटी टिप्पणियों के रूप में मौजूद होती है जो व्रतांत को महत्वपूर्ण बना देती हैं। जारी रहो साथी। शुभकामनाएं।

रंजन December 16, 2009 11:28 AM  

"इससे पहले जो दिल्ली देखी थी वो तो हर समय भीड़-भाड़ और शोर शराबे वाली थी पर इस बार वाली दिल्ली बिल्कुल अलग थी। साफ-सुथरी और दूर-दूर तक अच्छी खासी हरियाली फैली हुई।"

क्योंकि वो चाण्क्यपुरी थी.. वरना शायद आप को भीड़ भाड़ शोर शराबा सब मिलता...

आपका यात्रा वृतांत अच्छा लगा.. तस्विरें भी बहुत सुन्दर..

Manish Kumar December 20, 2009 7:33 PM  

Delhi ke aas paas kayi salon tak rehna hua hai. Isliye kayi baar in jaghon ke chakkar laga chuke hain. Haan akshardham ka mandir Gandhinagar wala hi dekha tha yahan ka nahin dekha.

Waise sari delhi mein mujhe Bahai Temple ke andar ki shanti mein prarthana karna sabse sukoon dene wala laga tha.

deepak December 25, 2009 3:52 PM  

You are fortunate as you managed time to see delhi other wise I who work here since two years never get time even to think about it. Its your kindness also as you like Delhi as people who struggle here, just think about the beauty Of Nainital and hill areas. Due to being National capital Delhi is undoubtly important but its vfery crowded and they who live here are really poor as they even cant think about to see Kutbmeenar, Lotus temple and Akshardham by the eyes person like you have. We cross that places in routine life but dont know about thier speciality.bye

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