Friday, August 13, 2010

महात्मा गांधी ने दिया था खुमाड़ गांव को `कुमाऊँ की बारादोली´ का नाम

देश को स्वतंत्र कराने के लिये जहां पूरे देश ने अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया वहीं कुमाऊं में अल्मोड़ा जिले के समीपवर्ती गांव खुमाड़ के लोगों की भी इस आंदोलन में महत्वपूर्ण भागीदारी रही है। 5 सितम्बर 1942 को खुमाड़ में स्वतंत्रता सेनानियों की भीड़ में, उस समय के एस.डी.एम. जॉनसन ने अंधाधुंध गोली चलाकर चार लोगों को मार दिया और कई लोगों को घायल कर दिया। इस हादसे के बाद महात्मा गांधी जी ने स्वयं खुमाड़ को `कुमाऊँ की बारादोली´ का नाम दिया।

गांधी जी के नेतृत्व में जहां भी जो भी आंदोलन हुए खुमाड़ के लोग कभी भी इन आंदोलनों से दूर नहीं रहे। चाहे वह सविनय अवज्ञा आंदोलन, नमक सत्याग्रह आंदोलन, कुली-बेगार आंदोलन, विदेशी बहिष्कार तथा अंग्रेजों भारत छोड़ों आंदोलन हों या फिर कोई और आंदोलन। खुमाड़ के लोगों ने हमेशा ही तन, मन धन से इन आंदोलनों में भरपूर भागीदारी की।



खुमाड़ में आजादी का बिगुल 1920 के दशक में युवा क्रांतिकारी पुरूषोत्तम उपाध्याय ने बजा दिया था। 1922 में जब गांधी जी को गिरफ्तार किया गया तो इन्होंने यहां के लोगों को एकजुट कर इस गिरफ्तारी का जबरदस्त प्रतिकार किया। सन् 1930 में जब इस इलाके में आजादी के लिये लोगों का जज्बा अपनी चरम सीमा पर था तब अंग्रेजों ने इस जज्बे को दबाने के लिये यहां के लोगों की सम्पत्ति कुर्क कर दी, फसलें उजाड़ दी और आंदोलनकारियों की जम कर पिटाई की। अप्रेल 1930 में ही नमक सत्याग्रह आंदोलन के दौरान लोगों द्वारा चमकना, उभरा तथा हटुली में नमक बनाया गया। इस दौरान माल गुजारों ने भी सामुहिक इस्तीफा दे दिया जिससे अंग्रेज और ज्यादा भड़क गये। 1 सितम्बर 1942 को जब आंदोलनकारियों ने स्वतंत्रता आंदोलन को और भी तेज करने की सोची तो अंग्रेजों से ये बरदास्त न हुआ और 5 सितम्बर 1942 को जॉनसन खुमाड़ पहुंच गया।

खुमाड़ सभा में पहुंचने पर गोविन्द ध्यानी ने जॉनसन का रास्ता रोकने की कोशिश की तो जॉनसन ने गोलियां चलानी शुरू कर दी। जब क्रान्तिकारी नैनमणि ने उसका हाथ पकड़ लिया तो जॉनसन ने गोलियां चलाने के आदेश दे दिये। इस गोलाबारी में गंगा राम, खीमानन्द, चूणमणि एवं बहादुर सिंह मेहरा शहीद हो गये जबकि गंगा दत्त शास्त्री, मधूसूदन, गोपाल सिंह, बचे सिंह, नारायण सिंह समेत कई अन्य क्रान्तिकारी घायल हो गये।

इस घटना से महात्मा गांधी बेहद दु:खी हुए और उन्होंने खुमाड़ को `कुमाऊँ की बारादोली´ का नाम दिया। और खुमाड़ को लोगों से अहिंस आंदोलन जारी रखने को कहा। इन शहीदों की याद में खुमाड़ में आज भी 5 सितम्बर को शहीद स्मृति दिवस मनाया जाता है।

6 comments:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

विनीता जी, जानकारी के लिए आभार।
………….
सपनों का भी मतलब होता है?
साहित्यिक चोरी का निर्लज्ज कारनामा.....

ताऊ रामपुरिया said...

इस विषय पर विस्तृत जानकारी मिली. ऐतिहासिक जानकारी के लिये बहुत आभार. शुभकामनाएं.

रामराम.

sunita said...

एक अच्छी एवं एतिहासिक जानकारी ....धन्यवाद

VICHAAR SHOONYA said...

ऐतिहासिक जानकारी के लिये धन्यवाद

मुनीश ( munish ) said...

Nayi Jaankari . Shukria .....

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) said...

बहुत ज्ञानवर्द्धक रही यह ऐतिहासिक जानकारी

स्वतंत्रता दिवस की अग्रिम शुभकामनाएं

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