Monday, May 10, 2010

हिमालय की यात्रायें





रामनाथ पसरीचा (1926-2002) पांच से अधिक दशकों तक हिमालय की यात्रायें करते रहे। अपने पिट्ठू पर कागज, रंग और ब्रश लिये उन्होंने 65 शिखरों के चित्र 10,000 फुट से 20,500 फुट की उंचाई पर बैठ कर बनाये हैं।

पसरीचा जी ने कई राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय प्रदर्शनियों में हिस्सा लिया। ललित कला अकादमी द्वारा उन्हें श्रेष्ठ कलाकार का सम्मान दिया गया। भारत सरकार के सांस्कृतिक विभाग ने उन्हें सीनियर फैलोशिप प्रदान की। आज भी उनके बनाये चित्र देश-विदेश के संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रहे हैं।


रामनाथ पसरीचा ने जितने सुंदर चित्र बनाये उतने ही सीधे और सरल भाषा में अपनी यात्राओं को लिखा भी है। यहां उनकी मसूरी में की गई यात्रा का यात्रा वृतांत दिया जा रहा है। यह यात्रा वृतांत उनकी पुस्तक हिमालय की यात्रायें से लिया गया है।


मसूरी


1947 की बात है। मुझे चित्रकला को अपनाये तीन साल हुए थे। अपने चित्रों के लिये नई प्ररेणा लेने मैं मसूरी गया। हम देहरादून से बस में सवार हुए। बस छोटी और टूटी-फूटी थी, लगता था जैसे पहाड़ी चढ़ाई पर उसका दम फूल रहा हो। अभी हम 6 मील भी नहीं गये होंगे कि हमें बादलों और धुंध ने आ घेरा। ऐसा लगा जैसे बस किसी शून्यता में चढ़ाई चढ़ती जा रही है।

रास्ता केवल 25 मील था मगर उसे पार करने में तीन घंटे लग गये। उस जमाने में मसूरी का बस अड्डा शहर से काफी नीचे की ओर था। बस अड्डे पर बोझा उठाने वाले बीसियों नेपाली ठंड में यात्रियों की प्रतीक्षा में बैठे रहते। वहीं मैंने एक बोझी से सामान उठवाया और लंढौर बाजार के एक छोटे से होटल में कमरा किराये पर ले लिया। खाना खाने के लिये होटल के आसपास कई पंजाबी ढाबे थे जिनमें अच्छा खाना मिल जाता था।

मसूरी के माल पर तब भी भीड़ होती मगर इतनी नहीं जितनी अब होती है। तब भी माल पर नौजवान युवक-युवतियों के जमघट लगे रहते और मौज-मस्ती रहती। मगर प्रकृति के शौकीनों के लिये मसूरी के चारों ओर पगडंडियों जाती, जिन पर घूमने में बहुत आनंद आता। मुझे टिहरी जाने वाली पगडंडी बहुत अच्छी लगी। मैं उस पगडंडी पर हर रोज प्रात:काल निकल जाता और खूब घूमता। पौंधों, जंगलों और पहाड़ों के चित्र बनाता। बारिश में धुलकर पेड़-पौंधों पर निखार आ जाता था। धूप से उनके रंग चटख हो जाते और गीली मिट्टी की सुगंध तथा पक्षियों की चहचहाहट से तबीयत खुश हो जाती। खच्चरों के गलों में बंधी हुई घंटियों की दूर से आती आवाज कानों को मीठी लगती है। धीरे-धीरे वह आवाज पास आ जाती और खच्चरों का काफिला पास से गुजर जाता। लाल टिब्बा अथवा गनहिल की चढ़ाई कठिन है। उस पर चढ़ने से शरीर की अच्छी खासी वर्जिश हो जाती। यहां से बंदरपूंछ, केदारनाथ, श्रीकंठ, चौखंबा और नंदादेवी शिखरों के दर्शन होते तो चढ़ाई चढ़ना सार्थक हो जाता। उन शिखरों पर सूर्योदय की लालिमा ने मुझे मोहित किया, अपनी ओर आकषिZत किया और उनके चित्र बनाने की प्रेरणा दी।
मसूरी में मौसी फौल के नाम से एक प्रसिद्ध झरना है। वहां जाने का रास्ता किसी की निजी जमीन से होकर जाता था। जमीन का मालिक अपना पुरान हैट पहने अपने मकान की खिड़की में बैठा रहता और एक अठन्नी लिये बिना किसी को वहां से निकलने न देता। झरने के आसपास शांति थी, मैं कई बार वहां, लेकिन हर बार जोंके शरीर पर चिपट जाती और जी भरकर खून चूसती। रात को किसी बैंच पर बैठकर शहर की बत्तियों को आसमान में खिले सितारों में घुलते-मिलते देखना अच्छा लगता। मैं यह दृश्य उस समय तक देखता रहता जब तक ठंड बढ़ नहीं जाती।

देहरादून से मसूरी जाने वाली पुरानी सड़क राजपुर से होकर निकलती। राजपुर से मसूरी तक एक पगडंडी भी जाती है। लगभग चार घंटे का पैदल रास्ता है। राजपुर से थोड़ा ऊपर जाने पर दून घाटी दिखाई देती है। दूर क्षितिज में गंगा और यमुना नदियों के भी दर्शन हो जाते हैं। आधे रास्ते में कुछ पुराने में कुछ पुराने समय से चली आ रही चाय की दुकानें हैं। पहाड़ी लोग वहां सुस्ताने बैठ जाते हैं और चाय पीते हैं। यहां रुककर चाय पीने में बड़ा मजा आता है। यहां से आगे पहले फार्म हाउस, फिर सड़क के दोनों ओर ऊँची-ऊँची इमारतें और फिर मसूरी दिखाई देने लगती है।

अब तो मसूरी एक बड़ा शहर हो गया है। जहां होटलों की भरमार है, जहां शनिवार और रविवार को मौज मस्ती के लिये लोगों की भीड़ देहरादून और दिल्ली से पहुंच जाती है। गनहिल पर भी चाट पकौड़ी वालों ने दुकानें बना ली हैं। अब वहां लोगों की भीड़ `केबल कार´ में बैठकर पहुंचती है। लोग चाट पकौड़ी खाते हैं, तरह-तरह के ड्रेस पहनकर फोटो खिंचवाते हैं और मस्ती करते हैं। इन दुकानों में हिमालय के वास्तविक सौंदर्य को ढक लिया है। पर्यटक नजर उठाकर उन्हें देखने का प्रयास भी नहीं करते। लेकिन `कैमल बैक वयू´ वाले रास्ते पर अभी भी शांति है। वहां ईसाइयों का पुराना कब्रिस्तान है और रास्ता बलूत और देवदार के पुराने जंगलों में से होकर निकलता है। लंढौर बाजार भी ज्यादा नहीं बदला है। उस बाजार के साथ पुराने लोगों की कुछ यादें अभी भी जुड़ी हैं।




लेखक द्वारा बनाया गया मसूरी का एक स्कैच

8 comments:

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) said...

bahut achcha laga inke bare me jaankar... nice presentation..

Happy Blogging

रंजना [रंजू भाटिया] said...

ऐसे यात्रा संस्मरण खुद में बाँध लेते हैं शुक्रिया इसको यहाँ पढवाने के लिए

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत ही सुंदर यात्रा वृतांत लिखा आपने. बहुत शुभकामनाएं.

रामराम.

sunita said...

nice one ........is britant ko padkar aisa laga jaisey hum mansuree pahunch gaye .......

ढपो्रशंख said...

आज हिंदी ब्लागिंग का काला दिन है। ज्ञानदत्त पांडे ने आज एक एक पोस्ट लगाई है जिसमे उन्होने राजा भोज और गंगू तेली की तुलना की है यानि लोगों को लडवाओ और नाम कमाओ.

लगता है ज्ञानदत्त पांडे स्वयम चुक गये हैं इस तरह की ओछी और आपसी वैमनस्य बढाने वाली पोस्ट लगाते हैं. इस चार की पोस्ट की क्या तुक है? क्या खुद का जनाधार खोता जानकर यह प्रसिद्ध होने की कोशीश नही है?

सभी जानते हैं कि ज्ञानदत्त पांडे के खुद के पास लिखने को कभी कुछ नही रहा. कभी गंगा जी की फ़ोटो तो कभी कुत्ते के पिल्लों की फ़ोटूये लगा कर ब्लागरी करते रहे. अब जब वो भी खत्म होगये तो इन हरकतों पर उतर आये.

आप स्वयं फ़ैसला करें. आपसे निवेदन है कि ब्लाग जगत मे ऐसी कुत्सित कोशीशो का पुरजोर विरोध करें.

जानदत्त पांडे की यह ओछी हरकत है. मैं इसका विरोध करता हूं आप भी करें.

Manish Kumar said...

रामनाथ पसरीचा के इस यात्रा वृत्तांत को पढ़कर यही लगता है कि अगर किसी शहर की आबो हवा मन में रचानी बसानी हो तो आपको वक्त देना होगा, शरीर को कष्ट देना होगा, प्रकृति की विविध लीलाओं को देखने के लिए संयम रखना होगा तभी आप उन पलों की मिठास को क़ागज़ के पन्नों या कैनवस तक ला पाएँगे।

आपका बहुत आभार इस लेख को यहाँ प्रस्तुत करने का।

निपुण पाण्डेय said...

बहुत अच्छी जानकारी दी है आपने विनीता जी !

मैंने आज तक रामनाथ पसरीचा जी के बारे में नही सुना था ..:( ! वास्तव में यह वृत्तान्त का अंश बहुत सुन्दर था ......आप इनकी किताब हिमालय की यात्राएँ के बारे में भी कुछ बता सकती हैं ? मैं पढना चाहूँगा !

डॉ. मनोज मिश्र said...

अच्छी जानकारी ,आभार.