Saturday, January 3, 2009

अल्मोड़ा यात्रा - 1

मैं पिछले 3-4 सालों से अल्मोड़ा का दशहरा देखने की सोच रही थी पर हर बार कुछ न कुछ ऐसा हो ही जाता कि सारा प्लान धरा का धरा रह जाता। इस बार पक्का इरादा था कि चाहे कुछ भी हो जाये जाना ही है। हालांकि एक बार तो लगा कि शायद इस बार भी न जा सकूं क्योंकि रात को भयानक आंधी-तूफान शुरू हो गये पर सुबह सब ठीक था। इसी कारण उठने में देर हो गई। मुझे सुबह 6.30 बजे स्टेशन पहुंचना था पर 6.15 घर में ही हो गये। मैं जल्दी-जल्दी तैयार हुई अपना सामान उठाया और स्टेशन की तरफ निकल गई। इस बार मैं अकेले ही थी इसलिये पहले ही सोच लिया था कि रोडवेज या के.एम.ओ.यू. की बस से जाउंगी। मुझे पूरी उम्मीद थी कि बस तो निकल गई होगी और अब पता नहीं कैसे पहुंचुगी पर मेरे आश्चर्य का कोई ठिकाना नहीं रहा जब मैंने सामने बस खड़ी देखी। मुझे लगा जैसे कोई बहुत कीमती चीज मिल गई हो जिसके मिलने की उम्मीद में खो चुकी थी।

मैं जल्दी से बस में चढ़ी और टिकट लिया। आगे की सारी सीटें भर चुकी थी इसलिये मुझे टायर के ऊपर वाली सीट में ही संतोष करना पड़ा। बस में यात्रा करने के अवसर कम ही मिलते हैं पर जब भी मिलते हैं तो बड़े मजेदार अनुभव होते हैं। जैसे इस बार हुआ। मेरे आगे की सीट में तीन लड़के बैठे थे। कहीं के भी हों पर पहाड़ी तो नहीं थे। उनको कौसानी जाना था और रात के आंधी-तूफान के कारण वो भी सुबह जल्दी नहीं उठ पाये इसलिये हाथ-मुंह धोये बगैर ही आ गये और एक-दूसरे से लड़ रहे थे कि - मैं तो जल्दी उठ जाता पर इसने उठने नहीं दिया। दूसरा कह रहा था - यार मेरे दिमाग मैं तो अभी भी तूफान चल रहा है। अगले ने कहा - मुझे तो समझ नहीं आ रहा था कि ये हो क्या रहा है ? पता नहीं सब सपने में हो रहा था या सच में।

देखते ही देखते बस इतनी भर गई कि लोगों को खड़े रहना पड़ा। इसमें ज्यादा लोग भवाली जाने वाले थे। खड़े हुए लोगों को देख के लगा कि अगर मुझे थोड़ी और देर होती तो कम से कम भवाली तक तो मुझे भी खड़े-खड़े जाना पड़ता जो मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है। अपनी अच्छी किस्मत के लिये मुझे गर्व महसूस हुआ। पर मेरी ये अच्छी किस्मत ज्यादा देर मेरे साथ नहीं रही क्योंकि मेरे बगल की सीट में एक बुजुर्ग महिला आकर बैठ गई। जैसे ही बस चलनी शुरू हुई उनको उल्टी आने का सा महसूस होने लगा और नहीं चाहते हुए भी मुझे खिड़की वाली सीट उनके लिये छोड़नी पड़ी। मन ही मन में बड़ी कोफ्त हो रही थी क्योंकि मुझे खिड़की से बाहर देखना अच्छा लगता है। उस समय लगा कि काश मुझे भी उल्टी होती तो अपनी सीट नहीं छोड़नी पड़ती लेकिन........। बस में यात्रा करने का ये एक अलग ही मजा है क्योंकि सब जन एक दूसरे से अलग तरह के होते हैं और आपको सब के साथ तालमेल बिठाना पड़ता है।

लगभग 30 मिनट में बस भवाली पहुंच गई। भवाली पहुंचते ही बस खाली हो गई और मुझे अपनी सीट वापस मिल गई। अब कुछ नये यात्री बस में चढ़ गये। इस बार मेरी बगल सीट में फिर एक महिला आ गई जो अल्मोड़ा ही जा रही थी। मैंने उनसे पहले ही पूछ लिया - क्या आपको उल्टी होती है ? उन्होंने कहा - नहीं ! मुझे तो रोजाना ही नौकरी के लिये सफर करना पड़ता है। अब मेरी जान में जान वापस आ गई। मेरे आगे की सीट में जो लड़के बैठे हुए थे उन्होंने भवाली में जाकर हाथ-मुंह धोया और चाय पी। उसके बाद उन्होंने एक नक्शा निकाला और आगे के रास्ते के बारे में देखने लगे। जब बस आगे बड़ी तो उनमें आपस में झगड़ा होने लगा। झगड़ा इस बात का था कि सब जन बारी-बारी से खिड़की वाली सीट में बैठेंगे और कोसी नदी को देखेंगे। एक जन ही पूरे मजे नहीं लेगा।

मेरी बगल वाली महिला ने मुझसे मेरे बारे में पूछा। मैंने उन्हें बताया कि मैं अल्मोड़ा दशहरा देखने जा रही हूं। उन्होंने कहा - उनका भी मायका अल्मोड़ा में है और वो हर साल दशहरे में वहां जाती हैं इससे दो फायदे होते हैं। एक तो दशहरा देखने मिल जाता है और दूसरा सब जन से मुलाकात हो जाती है क्योंकि जो अल्मोड़ा से बाहर रहते हैं वो दशहरे के समय में ही अल्मोड़ा आते हैं। उन्होंने मुझे दशहरे के बारे में कुछ और बताया जिसकी जानकारी मुझे पहले से ही थी। बस सिर्फ यात्रियों को उतराने और बैठाने के लिये ही रुक रही थी। बीच-बीच में झटके भी खा रही थी और मेरी सीट टायर के उपर होने के कारण हल्के झटके भी मुझे कुछ ज्यादा ही जोर से लग रहे थे।

बस में बैठे सब जन अपने-अपने में मस्त थे। कुछ लोग देश की राजनीति सही करने में लगे थे और कह रहे थे - मनमोहन को हटाना चाहिये क्योंकि उसने महंगाई बहुत बढ़ा दी। दूसरा कह रहा था - अरे यार तुम क्या जानते हो। बीजेपी आती तो और बुरा हाल होता। कुछ जो गांव में रहने वाले थे उनकी दुनिया उनकी खेती-किसानी तक थी और इस साल फसल से हुए फायदे नुकसान की बातें कर रहे थे। सब की बातें सुनते हुए रास्ता देखते हुए (इस रास्ते के बारे में मैंने जागेश्वर यात्रा में लिखा है) सफर आराम से कट गया और करीब 9.30 बजे में होटल सेवॉय में थी जहां मैंने पहले से ही रहने का इंतजाम करवाया था। वहां अपने पसंदीदा आलू के पराठे खाये और शम्भू जी, जो अल्मोड़ा में ही रहते हैं, के साथ घुमने निकल गई।

जारी........

15 comments:

Raushni said...

Apki yatra ki shuruaat to kafi intresting hai.

aage ki yatra ka humesha ki tarah intzaar rahega.

dr. ashok priyaranjan said...

प्रभावशाली शब्दावली ने अभिव्यक्ति को प्रखर बना दिया है । -

http://www.ashokvichar.blogspot.com

Tarun said...

होटल सेवॉय अल्मोड़ा का काफी पुराना होटल है, लाला बजार वगैरह की कोई तस्वीर ली हो तो जरूर दिखायें, काफी टाईम हो गया है देखे हुए, नराई सी लग रही है।

गरमपानी में आलू रायता, चाय पकौड़ी नही खायी लगता है।

डॉ .अनुराग said...

अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा .....बस एक ऐसी जगह है जहाँ आपको जिंदगी के कई दिलचस्प अनुभव मिलते है ओर जिंदगी की कई यादगार सीख भी.....यू पी के कंडक्टर का एक ख़ास अंदाज होता है यात्रियों को बुलाने का ओर टूटे पैसे न देने का..... आपकी यात्रा वतान्त दिलचस्प है

ताऊ रामपुरिया said...

लाजवाब यात्रावृतांत. बहुत सधी हुई भाषा मे प्रवाहमयी लिखा गया है. आगे का इन्तजार करते हैं.

रामराम.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत बढ़िया यात्रा विवरण लगा ...बस चित्रों की कमी खली

अशोक पाण्डेय said...

आपने बहुत प्रभावशाली यात्रा वृत्तांत लिखा है। रंजू जी ठीक कह रही हैं, यदि फोटो भी रहते तो और अच्‍छा होता।

P.N. Subramanian said...

यात्रा का प्रारंभिक विव्रण ही सम्मोहक है. हम अपने नेट की गति से लाचार हैं. पन्ने खुलने से इनकार करते हैं. कभी कभी अच्छी स्पीड मिलती है लेकिन वह कभी कभी कब आएगा वाली बात होती है. आभार.

मुसाफिर जाट said...

विनीता जी, नमस्कार.
अरे क्या यार तुम भी इतवार वाले दिन पोस्ट दिख देती हो. मैंने तो इसे बाईपास ही कर दिया था. बस, पड़ गयी नजर गलती से.
मैं भी इस जनवरी के लास्ट रविवार को नैनीताल आ रहा हूँ. सोमवार को भी वही पर रुकने का इरादा है. बस, आपको करना ये है कि कहीं बेहद सस्ता सा रूम दिलवा देना रात काटने के लिए. बाकी तो मैं खुद देख लूँगा.
और हाँ, आपका अल्मोडा पहुंचना बढ़िया लगा. कोसी नदी तो पूरे रास्ते साथ देती ही है.

Arun said...

sidhe saral shabdo mai Achha yatra vritant.

bhoothnath(नहीं भाई राजीव थेपडा) said...

यात्रा-वृत्तांत का अपना अलग ही इक मज़ा है.....ऐसा लगता है...जैसे हम ख़ुद ही सफर में हों....और कोफ्त भी कि ख़ुद भी सफर में क्यूँ नहीं हैं.....!!आपकी अल्मोडा यात्रा के दौरान भी कुछ ऐसा ही लगा.....!!

Abhishek said...

सही कहा आपने बस में सफर की बात ही और है. हर थोडी देर पर नए चेहरे, नई बातें. और ऐसे रास्तों पर से गुजरना जो की रेल से सम्भव नही होता.

Manish Kumar said...

bas mein bachche mein mujhe bhi ulti aane ki shikayat rehti thi.Aur Khidki prem se to sabhi ghumakkad grasit hote hain.:)

Zakir Ali Rajnish (TSALIIM) said...

अरे वाह, एक और यात्रा। अल्‍मोडा यात्रा के बारे में जानकर अच्‍छा लगा।

मुनीश ( munish ) said...

Hotel Savoy Mussorie mein bhoot hote hain so vahan usmen na rukna . Dhachke safar ka maza to dete hi hain
,muft ki massage bhi ho jaati hai . khoob badhiya likha aapne.