Thursday, December 18, 2008

चेन्नई यात्रा - भाग 4

जबसे मैं चेन्नई गयी थी तब से ही समंदर देखने के लिये बेचैन थी। एक दिन जब हम सभी बैठे हुए थे मैंने अपने साथ वालों से कहा - मुझे समन्दर देखना है क्योंकि उसको देखे बगैर तो यहाँ आने का कोई फायदा नहीं होगा और दूसरे ही दिन हम लोग महाबलीपुरम बीच के लिये निकल गये। महाबलीपुरम बीच में पत्थरों से बने विशालयकाय मंदिर और मूर्तियां हैं। जिन्हें देख के मैं बिल्कुल विस्मृत सी हो गयी थी और सहज ही मेरे मुंह से निकल पड़ा कि - दक्षिण भारत की कला श्रेष्ठता का कोई सानी नहीं है। बैहरहाल समंदर को देखने का यह मेरा पहला अनुभव था जो मेरे लिये बहुत खास था। मैं इतना विस्तृत समन्दर देखकर बेहद रोमांचित सा महसूस कर रही थी और मेरी तमन्ना थी कि मैं और भी बीच देख पाऊ इसी के चलते हमने मरीना बीच जाने की भी प्लानिंग वहां लहरों के साथ खेलते-खेलते ही बना डाली। शाम को जब हम घर वापस लौटे तो रेत से लदे हुए थे। करीब दो दिन के बाद हम लोग मरीना बीच पे थे जो कि दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बीच है।

मद्रास में रहते हुए एक चीज जो मुझे शिद्दत से महसूस हुई वो थी मद्रास का अपने संस्कृति और संस्कारों के प्रति समर्पण भाव। उन्होंने आज तक भी अपनी संस्कृति और संस्कारों को सहेज के रखा है। वहाँ लोग अपने ट्रेडिशनल कपड़े पहनना ही ज्यादा पसंद करते हैं। महिलाओं को खासतौर से सोने के गहने और बालों में वेणियां लगाने का बहुत ज्यादा शौक है। कहीं भी निकल जाइये वेणी की दुकान और सोने के गहनों से लदी औरतें देखना एक आम बात है।

कई सारे स्वादिष्ट व्यंजनों के अलावा जिसने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया वो थी वहाँ की कॉफी और नारियल की चटनी। कॉफी मेरी कमजोरी होने के कारण कॉफी पाउडर और उसे बनाने के लिये कॉफी मेकर को तो मैं अपने साथ ले के भी आयी और उसे बनाने का स्पेशल तरीका भी सीख लिया। कॉफी को परोसने का तरीका भी कॉफी जितना ही अच्छा था। एक छोटे से गिलास में कॉफी डालकर उसे कटोरीनुमा प्लेट में रखकर परोसा जाता है जिसे पीने में वो और भी ज्यादा स्वादिष्ट लगती है। अपनी वापसी से कुछ दिन पहले मैं सवर्णा (जो वहां की प्रसिद्ध दुकान मानी जाती है) में गई और अपने लिये मद्रास के कुछ यादें लेकर आयी।

दो दिन बाद मेरी वापसी नैनीताल के लिये थी पर अचानक ही बीमार हो जाने के कारण कुछ दिन और रुकना पड़ा। इसी बहाने मुझे वहाँ के अस्पतालों को भी देखने का मौका मिला। जिस डॉक्टर के पास मैं टैस्ट करवाने के लिये गई उन्होंने मुझे कहा कि - मुझे कम से 2-3 दिन और वहीं रुकना चाहिये उसके बाद ही वापसी के बारे में सोचूं तो अच्छा रहेगा। साथ ही साथ उन्होंने भी मुझसे पूछ लिया कि - क्या नैनीताल में बर्फ गिर गई है ? उनके सवाल से मुझे हंसी आ गई और मैंने हंसते-हंसते ही उन्हें जवाब दिया कि - नहीं ! अभी नहीं।

पहले तो मुझे बहुत बुरा लग रहा था कि वापसी के समय में बीमार पड़ना पर बाद में महसूस हुआ कि शायद जो होता है अच्छे के लिये ही होता है क्योंकि मुझे इस दौरान बसंत नगर बीच जाने का मौका मिल गया। मैंने वहाँ पर जी भर के 4-5 घंटे तक लहरों के साथ खूब खेला। अपने नाम रेत में लिखे और रेत के कई सारे महल भी खड़े किये जिन्हें बार-बार लहरें आ कर मिटा जाती थी और भी न जाने क्या-क्या किया क्योंकि इसके बाद तो पता नहीं मुझे फिर समन्दर देखने का मौका जाने कब मिलने वाला था। उसके बाद जिस रेस्टोरेंट में पहुचे, वो एक पंजाबी ढाबा था। जिसे कोई पंजाबी सज्जन ही चलाते थे। मीनू कार्ड देखा तो मैंने बिना देर किये अपने लिये एक प्लेट टिक्की और आलू का पराठा ऑर्डर किया। जिसे खाकर सच में मजा आ गया। इस बार भी अपने ऊपर ढेरों रेत लाद कर हम घर वापस आ गये।

दूसरे दिन नैनीताल के लिये मेरी वापसी थी। मैं मद्रास में कुछ समय और रहना एवं वहाँ के बारे में कुछ और भी जानना चाहती थी पर वापस आने की भी अपनी एक मजबूरी होती है जिसे टाला नहीं जा सकता था। अपने मद्रास प्रवास के दौरान मैं तमिल भाषा को ज्यादा तो नहीं समझ सकी पर हाँ मैंने 1-100 तक की गिनती पूरी सीख ली थी और अपने नोट पैड में लिख भी ली। अगले दिन हम लोग एयरपोर्ट के लिये निकल गये। मैं जब एयरपोर्ट में बैठी थी और अब घर वापस आने की थोड़ी उतावली भी महसूस करने लगी थी उसी समय एक सज्जन मेरे पास आये जो कि मद्रास के ही थे, मुझसे बोले - मुझे पानी की बोतल लेनी है क्या आप मेरा सामान थोड़ी देर के लिये देखेंगी ? मैंने हाँ वाले अंदाज में सिर हिला दिया। कुछ देर बाद वो वापस आये और हम दोनों में बातें होने लगी। जब मैंने उन्हें बताया कि मैं नैनीताल की रहने वाली हू तो उन्होंने झट से मेरे पांव छू लिये। उनके इस तरह के व्यवहार से मुझे थोड़ा अजीब महसूस हुआ और मैंने उनसे बोला कि आप ऐसा क्यों कर रहे हैं ? आप मुझसे उम्र में बड़े हैं। तब उन्होंने मुझसे कहा कि तुम हिमालय के नजदीक रहती हो और वहाँ के लोगों में तो भगवान रहते हैं। उनका पहाड़ों के प्रति इस आदर और सम्मान ने मुझे बेहद भावुक कर दिया और मुझे अपने पहाड़ों पर गर्व महसूस होने लगा। दिल्ली पहुंचने पर उन्होंने मुझे नोट पैड, कलम और गणेश जी कि मूर्ति उपहार में दी जो मेरे लिये इस यात्रा की सबसे ज्यादा यादगार और अनमोल निशानी हैं। उसके बाद वो सज्जन अपने रास्ते चले गये और मैं नैनीताल वापस आ गई।

(समाप्त)

17 comments:

Amit said...

bahut accha raha aapka yaatra vritaant.....

ताऊ रामपुरिया said...

बेहद सुन्दरता से आपने मद्रास का यात्रा विवरण लिखा जिसे पढने का आनन्द हमने भी लिया बल्कि बीच बीच मे तो ऐसा लगा कि हम भी आपके साथ ही यात्रा मे हैं !

मद्रासी सज्जन ने सही किया आपके पांव छूकर ! आपकी भावना पवित्र है तो आप पांव छूने के काबिल हैं और भावना अच्छी नही तो किसी काम के नही !

हम भी पास होते तो पांव छूते पर अब आप प्रणाम स्वीकार किजिये और आपकी इस शैली मे लिखी अगली पोस्ट पढवाईये !

राम राम !

विनीता यशस्वी said...

Tauji apne bahut hi bari baat likh di hai.

aap mujhse bare hai aur bare hone ke naate mai hi apke pav chhuna achha manugi. aap apne hath humesha ashirwaad dene ke liye hi utaiyega.

Zakir Ali 'Rajneesh' said...

बहुत खूब।

अंत भला तो सब भला।

PD said...

ek aap hain aur ek mera yah mitra amit, jo chennai chhorkar jaane ki chaah bhi saarvjanik kar rakha hai.. sikh Amit.. kuchh sikh.. ;) (Just Kidding)
badhiya vritant likhi hai aap.. kahiye agli baar kab aa rahi hai vaapas? aane par miliyega jaroor.. :)

योगेन्द्र मौदगिल said...

बेहतरीन यात्रा-कथा पढ़ते वक्त लग रहा था कि आपके साथ ही हैं

मुसाफिर जाट said...

[जब मैंने उन्हें बताया कि मैं नैनीताल की रहने वाली हू तो उन्होंने झट से मेरे पांव छू लिये। उनके इस तरह के व्यवहार से मुझे थोड़ा अजीब महसूस हुआ और मैंने उनसे बोला कि आप ऐसा क्यों कर रहे हैं ? आप मुझसे उम्र में बड़े हैं। तब उन्होंने मुझसे कहा कि तुम हिमालय के नजदीक रहती हो और वहाँ के लोगों में तो भगवान रहते हैं। ]
...
विनीता जी, इस घटना ने तो मुझे भी बहुत भावुक कर दिया है. एक बार मैं नागपुर से दिल्ली जा रहा था. ट्रेन में एक दक्षिण भारतीय परिवार था. उन्होंने मुझसे वैसे ही पूछ लिया कि कहाँ के रहने वाले हो. मैंने बताया- हरिद्वार. इतना सुनते ही उनका नजरिया बदल गया. फिर तो दिल्ली तक मैं उनके परिवार का ही एक सदस्य बन गया था.

Manish Kumar said...

चेन्नई जाते समय कटोरी और प्याली साथ में सर्व होते देख मैं भी अचकचा गया था। फिर मैंने इर्द गिर्द नज़रें घुमाईं तो समझ आया कि माज़रा क्या है। अच्छा लगा आपका ये वर्णन..

BrijmohanShrivastava said...

द्रश्य काव्य /पढ़ते भी जाओ देखते भी जाओ /शैली ऐसी ही होना चाहिए कि पाठक के सामने द्रश्य आने लगें समंदर ,विशालकाय मूर्तियाँ ,सोने के गहने ,वेणियाँ,नारियल की चटनी हमारे यहाँ भी बनती है मूमफली दही बगैरा से /आख़िर महसूस करना ही पड़ा कि ""गोड डज.....गुड "" यह लेख सम्हाल कर रखो /इंटरनेट पर ज़्यादा लिखेंगे तो कोई पढेगा नहीं / अपने डाकुमेंट में रखो ,जब भी फुरसत मिले पढो ,बहुत से ऐसे क्षण याद आयेगे जो इस लिख में नही लिख पाये होंगे उनको बढाते चलो ,सुनी देखी ,महसूस की गई हजारों बातें हजारों अनुभव लेख में बढ़ते चले जायेंगे /किसी को पढ़वाना नही है एक आत्म संतुष्टि के लिए एक आत्मकथ्य /एक पुस्तकाकार एक उपन्यास जैसा /जब भी उस किताब को उठाएंगे ऐसे लगेगा कोई बिछुडा साथी मिल गया

विनीता यशस्वी said...

मुझे ऐसा महसूस हो रहा है कि मेरी मेहनत सफल हो गई।

ब्रजमोहन जी आपने बिल्कुल सही कहा कि बहुत सी बातें अनलिखी ही रह जाती है। मेरा साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ है। बहुत सा ऐसा है जो मैं नहीं लिख पाई यह सोचकर कि शायद इन बातों को अपने तक ही रखूं पर वो सब बातें अपनी डायरी में लिखी हैं जिन्हें कभी-कभी पढ़ना बहुत सकून देता है।

Arun said...

Bahut hi pyari yatra karvayi hai tumne vineeta.

agli baar bhi kisi ais hi yatra mai apke sath jaane ka intzaar rahega

Raushni said...

Vineeta bahut achha laga apka ye yatra vritant.

sidheshwer said...

अब तो दिल कह रहा है कि चलो चेन्नई.
देखें जेब कब कहती है कि चलो चेन्नई!!

PD said...

जब भी दिल कहे कि चेन्नई चलना है..
याद रखें कि पीडी चेन्नई में है.. :)

Harsh pandey said...

aapka yatra vivran padkar bahut achcha laga.

Abhishek said...

चलिए आप पहाड़ों से लेकर सागर तक घूम आयीं. दक्षिण भारत वास्तव में एक सांस्कृतिक क्षेत्र है और अपनी परम्परा से जुड़ा हुआ भी. विकास के लिए इसने अपनी परम्परा को छोड़ा नहीं. यात्रा विवरण के लिए धन्यवाद.

डॉ .अनुराग said...

दिलचस्प अंदाज ओर कहने की कला......ओर अच्छा इन्सान ही ऐसी भावनाए रख सकता है