Monday, March 29, 2010

काशीपुर पर कवि गुमानी की कविता

मैंने अपनी पिछली पोस्ट में काशीपुर के इतिहास के बारे में लिखा था। कुमाऊं के प्रसिद्ध कवि गुमानी यहीं पैदा होते थे। सिद्धेश्वर जी के कहने पर मैं गुमानी जी की काशीपुर पर लिखी रचना यहां लगा रही हूं।

कथावाले सस्ते किरत धर पोथी बगल में।
लई थैली गोली घर-घर हसीमी सब करै।।

रंगीला-सा पत्रा कर शरत जोशी सब बनै।
अजब देखा काशीपुर शहर सारे जगत में।।

यहाँ ढेला नहीं उत बहत गंगा निकट में।
यहाँ भोला मोटेश्वर बहत विश्वेश्वर वहाँ।।

यहाँ संडे दंडे कर धर फिरें साँड उत्तही।
परक क्या है काशीपुर शहर काशीनगर में।।

Tuesday, March 23, 2010

ऐसा है काशीपुर का इतिहास

काशीपुर उत्तराखंड का तराई वाला शहर है। काशीपुर का इतिहास भी बिल्कुल अनोखा है।

काशीपुर को हर्ष के समय (606-641 ए.डी.) में गोविषाण नाम से जाना जाता था। लगभग इसी समय में यहाँ चीनी यात्री ह्वेनसांग भी आया था। इस जगह का नाम काशीपुर, चन्द राजा काशीनाथ अधिकारी के नाम पर पड़ा। जिन्होंने इसे 16-17वीं शताब्दी में बसाया था। काशीपुर चन्द राजाओं का निवास स्थल रही है। कुमाऊँ के प्रसिद्ध कवि गुमानी की जन्मस्थली भी काशीपुर ही रही।
 
काशीपुर के पुराने किले को उज्जैन कहा जाता है। उज्जैन किले की दीवारें 60 फुट ऊँची है और इसमें इस्तेमाल हुई ईंटें 15x10x2.5 इंच की हैं। इस किले में उज्जैनी देवी की मूर्ति स्थापित है। यहाँ चैत माह में चैती का मेला लगता है।  इसके पास द्रोण सागर है। ऐसी मान्यता है कि इस सागर को पाण्डवों ने अपने गुरू द्रोणाचार्य को गुरूदक्षिणा के रूप में देने के लिये बनाया था। यह 600 वर्ग फुट का है। इसके किनारे कई देवी-देवताओं के मंदिर हैं। द्रोणसागर को अब आर्कियोलॉजिकल डिपार्टमेंट का संरक्षण प्राप्त है।

इसके पास मोतेश्वर महादेव का मंदिर है। इसे शिव के बारह ज्यार्तिलिंगों में से एक माना जाता है। इसके पास में ही जागेश्वर महादेव को मंदिर भी है जो 20 फुट ऊँचा है। काशीपुर का सबसे प्रसिद्ध मंदिर है बाल सुन्दरी का, जिसे चैती देवी के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ नवरात्रियों में मेला लगता है। इस मंदिर का शिल्प मस्जिद के समान है जिससे यह पता लगता है कि इसे शायद मुगल साम्राज्य के समय में बनाया गया होगा।



चैती देवी का मंदिर



Saturday, March 20, 2010

नैनीताल के राजभवन में स्थित गोल्फ कोर्स का इतिहास

पिछली एक पोस्ट में मैंने नैनीताल के राजभवन के बारे में बताया था। इस पोस्ट में मैं राजभवन में बने गोल्फ कोर्स के बारे में कुछ।




राजभवन का निर्माण 1900 में हुआ और इसमें बने गोल्फ कोर्स का निर्माण सन् 1926 में हुआ। इसे यूनाइटेड प्रोविसेंस के गर्वनर जनरल मैलकम हैली ने बनवाया था। यह गोल्फ कोर्स 50 एकड़ भूमि में फैला है और इसका सम्पूर्ण डिजाइन व निर्माण ब्रिटिश फौज के इंजीनियरों द्वारा किया गया। यह गोल्फ कोर्स समुद्र सतह से 6475 फीट की ऊँचाई पर स्थित है।

इस कोर्स में 18 होल है तथा अलग-अलग तरह की 18 टी बनी हुई हैं। ब्रिटिश समय में गोल्फ ब्रिटिश ऑफिसर्स का पसंदीदा खेल हुआ करता था इसलिये इस मैदान में उस समय काफी चहल-पहल रहती थी। वर्ष 1927 में ब्रिटिश अधिकारी एच. एलीना ने इस मैदान गोल्फ मैदान में सबसे अधिक 24 अंक प्राप्त किये।

भारत के आजाद होने से पहले यह गोल्फ मैदान हफ्ते में सिर्फ मंगल, बृहस्पति और इतवार को ही खुलता था। सन् 1980 तक यह मैदान आम लोगों के लिये बंद रहता था पर वर्ष 1994 में उस समय के राज्यपाल मोती लाल बोरा ने इसे सभी लागों के लिये खुलवा दिया। उसी समय से यहां प्रतियोगितायें भी शुरू होने लगी। गर्वनर्स गोल्फ कप प्रतियोगिता यहां होने वाली राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता है।


Wednesday, March 17, 2010

औली के बारे में कुछ

औली उत्तराखण्ड का एक भाग है। यह 5-7 किमी. में फैला छोटा-सा स्की रिसोर्ट है। इस रिसोर्ट को 9,500-10,500 फीट की ऊंचाई पर बनाया गया है। यहां बर्फ से ढकी चोटियां बहुत ही सुन्दर दिखाई देती हैं। इनकी ऊंचाई लगभग 23,000 फीट है। यहां पर देवदार के वृक्ष बहुतायत में पाए जाते हैं।

औली में प्रकृति ने अपने सौन्दर्य को खुल कर बिखेरा है। यात्रा करते समय आपको गहरी ढ़लानों और ऊंची चढाई चढ़नी पड़तीं है। यहां पर सबसे गहरी ढलान 1,640 फुट पर और सबसे ऊंची चढा़ई 2,620 फुट पर है। यहां पर केवल स्किंग और केवल स्किंग की जा सकती है। इसके अलावा यहां पर अनेक सुन्दर दृश्यों का आनंद भी लिया जा सकता है। नंदा देवी के पीछे सूर्योदय देखना एक बहुत ही सुखद अनुभव है। नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान यहां से 41 किमी. दूर है।

यहां पर स्की करना सिखाया जाता है। गढ़वाल मण्डल विकास निगम ने यहां स्की सिखाने की व्यवस्था की है। यह ट्रेनिंग हर वर्ष जनवरी-मार्च में दी जाती है। मण्डल के अलावा निजी संस्थान भी ट्रेनिंग देते हैं।

औली की यह तस्वीरें मुझे ताउजी ने मेल से भेजी थी। जिन्हें उन्होंने अपनी औली यात्रा के दौरान स्वयं लिया है।












Wednesday, March 10, 2010

मेरी बिनसर अभ्यारण्य की यात्रा - 3

अगले दिन साल की अंतिम सुबह थी और हम हिमालय के सामने थे। सूर्योदय के समय हिमालय देखने के लिये हम ने शाम से ही पूरे इंतज़ाम कर लिये थे। रैस्ट हाउस वालों से सूर्योदय का समय और जगह भी पूछ ली थी। उसी के अनुसार अलार्म लगा लिये। सुबह अलार्म बजते ही बगैर आलस किये उठे और सूर्योदय देखने चल दिये। अभी हल्का हल्का अंधेरा था और सूर्य की किरणें आती हुई दिखाई दे रही थी। पर उस जगह पर पहले से ही सैलानियों की भीड़ कैमरों, विडियो कैमरों के साथ जुटी हुई थी। जो जैसे भी संभव हो हिमालय के उस रूप को अपनी यादों में रखना चाहता थे और कुछ लोग उस नज़ारे को अपनी आंखों में ही समेट लेना चाहते थे। इसलिये एक टक हिमालय को देख रहे थे। अंत में सब को सब्र का फल मिला और एक शानदार सूर्योदय का नज़ारा सबकी आंखों के सामने था। सूर्य की पहली किरण हिमालय पर पड़ी और हिमालय लाल होने लगा। खटा-खट ढेरों कैमरे एक साथ खटकने लगे। सब लोग हिमालय को बस देखे जा रहे थे। यह वास्तव में सम्मोहित कर देने वाला नज़ारा था। हद से ज्यादा ठंडी के बावजूद भी सब वहां पर जमे रहे। कोई भी उस जगह से जाना नहीं चाहता था। धीरे-धीरे सूर्य पूरा निकल आया और हिमालय भी अपने वास्तविक रूप में लौट आया। हम कुछ देर उस जगह पर टहले और फिर कॉफी पीने आ गये।
आज हमने फैसला किया था कि दोपहर के खाने से पहले हम उस फील्ड की ओर जायेंगे जिसे कल आते समय देखा था और दोपहर के खाने के बाद ज़ीरों पाइंट जायेंगे। इसलिये नाश्ता करने के बाद हम लोग फील्ड की ओर आ गये। मैं अपने साथ चिड़ियों की किताब और बाइनोक्यूलर भी ले गयी यह सोच कर कि शायद बहुत सारे पंछी देखने को मिल जायेंगे। पर मेरे लिये यह बेहद उदास कर देने वाला रहा कि मुझे आकाश में उड़ते हुए लैमरजियर के अलावा कोई परिंदे नहीं दिखे। सिर्फ उनकी आवाजें़ सुनाई दे रही थी। यह रास्ता काफी सुनसान सा था और सड़क पर चलने वाले हम पांच लोग। अचानक हमें जंगल से किसी जानवर की चिल्लाने की आवाज़ें आयी। हालांकि हमें लगा कि ये बार्किंग डियर है पर फिर भी एक डर सा बैठ गया क्योंकि जंगल के जानवरों को चाहे हम न देख पाये पर उनकी नज़र तो हम पर हर समय रहती ही है। खैर हमने फैसला यही किया कि आगे को ही बढ़ेंगे ही वैसा ही हमने किया। कुछ पैदल और चलने के बाद हम लोग फील्ड में पहुंच गये। इस फील्ड पर आज कुछ बच्चे खेल रहे थे।

 हम इस फील्ड के पास पहुंचे तो पता चला कि यहां पर एक प्राचीन शिव मंदिर भी था। यह मंदिर बिनेश्वर महादेव का है। इस मंदिर को 16वीं शताब्दी में चंद राजाओं द्वारा बनाया गया था। यहां एक बाबाजी थे, उन्होंने हमसे वहां आने का कारण पूछा। मेरे हाथ में किताब देख कर उनको यह भी महसूस हो रहा था कि हम शायद कोई शोध छात्र हैं और उस जगह किसी शोध कार्य के लिये आये हैं। खैर बाबाजी को बताया किताब तो बस ऐसे ही। पता नहीं उन्हें यकीन हुआ या नहीं पर बाबाजी थे तो पूरे हाइटेक। उन्होंने हमें अपना ई.मेल ऐड्रेस दिया और बोला कि हम उनसे मेल से सम्पर्क कर यहां के बारे में पता कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि वो इस जगह में काफी समय से रह रहे हैं और ये भी कहा कि वो हमें लेपर्ड भी दिखा सकते हैं क्योंकि उनको पता है कि वो किस जगह पर हैं। मेरा बाबाओं पर कभी भी विश्वास नहीं रहा जिसके चलते मैंने अपने साथ वालों से साफ तौर पर मना कर दिया। मेरा कहना बांकि लोगों ने मान लिया और बाबाजी को मना कर दिया। कुछ देर बाद हमने देखा बाबाजी ने अपना लैपटॉप का बैग उठाया बाइक पर बैठे और चल दिये।

मंदिर के दर्शन करने के बाद हम लोग कुछ देर फील्ड की ओर आ गये। फील्ड काफी बड़ा था। एक तरफ बच्चे खेल रहे थे कुछ देर हमने भी उनके साथ खेला फिर हम दूसरी ओर के फील्ड में गये और घास के उपर सो गये। सर्दियों की धूप में इस तरह सोने का कुछ और ही मजा होता है। हम करीब 1 घंटा यूं ही घास पर पड़े रहे और उसके बाद रैस्ट हाउस वापस आ गये क्योंकि फिर हमें ज़ीरो पाइंट की ओर भी जाना था।
दोपहर का भोजन करने के बाद हमने कुछ देर आराम किया और फिर कल वाले रास्ते में ज़ीरों पाइंट की ओर चले गये। यह इस जगह का सबसे उंचाई वाली जगह है। यहां से हिमालय की बहुत बड़ी श्रृंखला दिखायी देती है। यह रास्ता कच्ची सड़क वाला है जो दोनों तरफ जंगल से घिरा है। काफी ज्यादा पैदल चलने के बाद आज हम ज़ीरो पाइंट पहुंच ही गये थे। यहां एक वॉच टावर है जिसका इस्तेमाल जंगलों में चारों तरफ आग देखने के लिये किया जाता है। हालांकि इसमें चढ़ने की मनाही है पर फिर भी हम लोग इसमें चढ़ गये। एक माला ऊपर चढ़े ही थे कि अगले माले की सीढ़ियां बुरी तरह हिल रही थी और उनकी दिशा खाई की ओर थी। 

ज़रा भी पैर हिला तो सीधे खाई में इसलिये हम वापस हो लिये और हिमालय दर्शन के लिये बनी जगह पर चले गये। वहां से मैंने देखा कि एक सज्जन स्पीड से उस वॉच टावर के टॉप में पहुंच गये। मैंने अपने साथियों को कहा  - वो जिस अंदाज़ से चढ़ रहे हैं जरूर फौजी होंगे। इतने में ही बगल से आवाज़ आयी - वो मेरा बेटा है। हमने उनकी तरफ देखा। एक युवा बुजुर्ग हमसे कह रहे थे - मैं भी फौज में था और मेरा बेटा भी फौज में कर्नल है। उन्होंने हमें अपने फौज के कई सारे अनुभव बताये जिनमें की सियाचीन में उनके प्रवास के अनुभव भी शामिल थे। उनसे बात करके बहुत अच्छा लगा और उससे भी ज्यादा अच्छा यह था कि उम्र में हमसे बहुत बड़े होने के बावजूद उनका व्यवहार हमारे साथ काफी दोस्ताना रहा। वो काफी जिन्दादिल लगे।

अब दोपहर ढलने लगी थी। हम लोग वापस रेस्ट हाउस आने लगे। आते हुए हम एक पगडंडी कहीं दूसरी ओर जाती हुई दिखी और आदत से मजबूर हम लोग उस पर आगे बढ़ गये यह देखने के लिये कि आखिर यहां क्या है ? हमें यहां एक कॉटेज दिखाई दिया जिसके बाहर एक चपरासी था। हमने उससे पूछा तो उसने बताया कि ये फॉरेस्ट वालों का रैस्ट हाउस है। उस जगह आने का हमें एक फायदा यह हुआ कि शानदार सूर्यास्त देखने को मिल गया। वहां कुछ देर रुकने के बाद हम लोग वापस रैस्ट हाउस आ गये और कमरे में चले गये। ठंडी हद से ज्यादा थी सो रज़ाई ढक कर गप्पें मारने लगे। लगभग 8 बजे हम रात का खाना खाने डाइनिंग हॉल में आये। ठंडी का आलम यह था कि प्लेट में खाना पड़ते ही ठंडा हो जा रहा था। उस पर वहां गरमी का कोई भी साधन नहीं था। अंगुलियां बिल्कुल टेढ़ी हो रही थी। ठंडी में कांपते हुए हाथों से खाना निपटाया और वापस कमरे में आये। काफी देर तक गप्पें मारते रहे क्योंकि हमने तय कर रखा था कि रात 12 बजे का तो हर हाल में इंतज़ार करना ही है।

रात 12 बजे जब हम लोग अपने कमरे में उधम मचा रहे थे तभी बाहर से पटाखों की आवाज़ें सुनाई दी। बाहर निकल कर देखा टेरिस में कुछ सैलानी पटाखे चला कर नये साल का स्वागत कर रहे थे। हालांकि यह तरीका हम सब की पसंद का नहीं है पर उस समय लगा कि हमें भी उनके साथ जाना चाहिये सो उनके पास पहुंच गये। उस टीम में बड़े, बुजुर्ग, बच्चे सब शामिल थे इसलिये हम भी उनके साथ जमा देने वाली ठंडी में करीब एक-डेढ़ घंटे तक हंगामा करते रहे फिर सबको नये साल की शुभकामनायें देते हुए कमरे में वापस आ गये।

अगली सुबह नये साल की पहली सुबह थी और आज भी हम हिमालय के सामने थे पर आज नज़ारा उतना सुन्दर नहीं था जितना पहले दिन था। आकाश में हल्के-हल्के से बादल छाये थे और ठंडी तो हद से ज्यादा बढ़ी हुई थी। रात में इतना पाला गिरा था कि पूरी घाटी पाले से सफेद हो गयी थी। कुछ सैलानियों ने इसे देखा और बोले बर्फ पड़ी है और हमें भी समझा रहे थे कि बर्फ पड़ी है। हमें उन्हें समझाना पड़ा कि यह बर्फ नहीं है ओस है पर सर्दियों के मौसम में ये जम जाती है जिसे पाला कहते हैं, जो कि सर्दियों के मौसम में पहाड़ों होता ही है।

आज हमारा वापसी का दिन था इसलिये रैस्ट हाउस के मैनेजर से कह के हमने अपने लिये अच्छी सी टैक्सी मंगवा ली। नाश्ता किया और टैक्सी से वापस हो लिये... बिनसर में तो हम सभी बाहरी संपर्कों से दूर रहे इसलिये कुछ पता नहीं चला पर जब वापस पहुंचे तो पता चला कि सद्दाम हुसैन को फांसी लगा दी गई है। यह खबर दिल को उदास कर गई...

Monday, March 8, 2010

मेरी बिनसर अभ्यारण्य की यात्रा - 2

अल्मोड़ा से बिनसर अभ्यारण 30 किमी. की दूरी पर है। बिनसर अभ्यारण्य जाने के लिये हम जिस टैक्सी में बैठे वो तो कमाल थी। टैक्सी सड़क पर चल नहीं उड़ रही थी। हालांकि यह रास्ता बहुत अच्छा है पर ड्राइवर ने तो जैसे कसम खाई थी कि वो धीरे-धीरे नहीं चलेगा। उसे धीरे-धीरे चलने को कहा तो उसने जवाब दिया - मुझे वापस भी तो आना है। यहां तो जंगल का इलाका है और फिर में वापसी में अकेला ही होऊंगा। यहां तो तेंदुए कभी कभी सामने ही दिख जाते हैं और फिर मैं बहुत डर जाता हूं। अपने डर के चक्कर में भाई ने हमारी जान मुसीबत में डाल दी।

खैर हम लोग आगे बढ़ रहे थे और जंगलों के बीच से एक अच्छी सी सड़क जा रही थी। जब हम सेंक्च्यूरी के प्रवेश द्वार में पहुंचे तो हमें वहां पर कुछ टैक्स देना पड़ा शायद 100 रुपया पर अब में भूल चुकी हूं कि ये 100 रुपये सबके लिये था या सिर्फ एक का। खैर ड्राइवर ने हमें बोला कि ये चुंगी हमें देनी होगी। सो हमने टैक्स दे दिया और आगे बढ़ गये।

यहां से रास्ता अच्छा हो गया था और जंगल भी घना हो चला था। इस अभ्यारण्य में बुरांश, जो उत्तराखंड का राजकीय पुष्प है, का जंगल है पर आजकल इनमें फूल नहीं खिले हुए थे। कुछ एक पेड़ों में एक - दो फूल दिख रहे थे। बिनसर में कई तरह के जानवर और पक्षी पाये जाते हैं पर इन्हैं देख पाना थोड़ा मुश्किल ही होता है। आगे बढ़ते हुए एक बहुत प्यारा सा घास का मैदान दिखायी दिया जिसमें कुछ विदेशी सैलानी और कुछ गांव के ही लोग नज़र आये। हमने उसी समय तय कर लिया था कि अगला दिन हम ट्रैक करते हुए इस जगह आयेंगे और कुछ समय यहां पर बितायेंगे।

रास्ता काफी लम्बा था और उस पर ड्राइवर की खतरनाक ड्राइविंग...। हमें अब रैस्ट हाउस पहुंचने की उतावली होने लगी थी। वैस भी सब थक चुके थे और कुछ देर तो आराम करना ही चाहते थे और उस पर भूख के मारे बुरा हाल था। आखिरकार जैसे-तैसे सही सलामत रैस्ट हाउस पहुंच गये। 

बुकिंग हम पहले ही करा चुके थे इसलिये आसानी से हमें कमरा मिल गया। जब हमने बुकिंग कराई थी उस समय कोई भी कमरा नहीं लगा था और आज एक भी कमरा खाली नहीं था। यहां ज्यादा बंगाली लोग ही थे। मेरा हमेशा से ही मानना रहा है कि हिन्दुस्तान में सबसे अच्छा घुमक्कड़ बंगाली ही होता है। खैर हम अपना सामान अपने कमरे में ले गये और खाने के लिये पूछा। वहां काम करने वाले ने बताया कि - अभी कुछ देर ही किचन और खुला रहेगा फिर बंद हो जायेगा। इसलिये खाना हो तो जल्दी आओ। एक बात और कही कि - हम खाना कमरे मेें नहीं देते इसलिये आपको डाइनिंग हॉल में ही आना होगा। हम लोग जल्दी से खाने के लिये चले गये और दाल-चावल खाया। जिससे हमारी भूख तो शांत हो गई और फिर कमरे में वापस आकर कुछ देर आराम किया। हमारे कमरे की खिड़की से ही हिमालय को शानदार नज़ारा दिख रहा था पर इस समय हिमालय पर बादल आ चुके थे इसलिये साफ नहीं था।

बिनसर अभ्यारण्य पहुंच कर अच्छा लग रहा था। इस अभ्यारण्य की स्थापना 1988 में हुई। यह 45.59 किमी. स्क्वायर के क्षेत्र में फैला हुआ है। इसके अंदर 9 गांव आते हैं। जिस समय इस अभ्यारण्य की स्थापना की गई, ग्रामीणों द्वारा इसका विरोध किया गया जो आज भी बदस्तूर जारी है क्योंकि इसके बन जाने से उनके जंगलों के अधिकार छिन गये और जंगल से जानवर किसी भी समय गांव के क्षेत्र में आ जाते हैं और फसलों और इंसानों को नुकसान पहुंचाते हैं। बिनसर की पहाड़ियों को झंडी धार पहाड़ियों के नाम से जाना जाता है। यह एक समय में चन्द राआओं की राजधानी हुआ करता था। बिनसर अभ्यारण्य में कई तरह के परिंदे, जानवर और पेड़-पौंधे पाये जाते हैं।

कुछ देर आराम करने के बाद हम जंगल की तरफ घूमने निकल गये। रैस्ट हाउस वाले ने सावधान कर दिया था कि - जंगल में इधर-उधर मत जाइयेगा क्योंकि यह ओपन सेंक्च्यूरी है कहीं से भी कोई आ सकता है। हम एक रास्ते पर आगे बढ़ते चले गये। यह रास्ता ज़ीरो पाइंट को जाता था। पर काफी चल लेने के बाद भी जब हम ज़ीरो पाइंट नहीं पहुंच पाये तो समझ नहीं आया कि वापस हो जायें या आगे ही बढ़े क्योंकि अब सूर्य डूबने लगा था और अंधेरा हो रहा था। 


जंगल से कुछ डरावनी सी आवाजे़ भी सुनाई दी और उस सन्नाटे में तो आवाज़ें कुछ ज्यादा ही डरावनी लग रही थी। हम इसी उधेड़बुन में लगे थे कि सामने से दो बंगाली आये और उन्होंने बताया कि ज़ीरो पाइंट यहां से अभी थोड़ा दूर और है पर रात होने लगी है इसलिये आगे न जा कर वापस लौट जाओ। जंगल में रात के समय रहना अच्छा नहीं है। उन की बात मान हम वापस आ गये और रैस्ट हाउस के टैरिस पर चले गये। आकाश चमक रहा था और छोटे-छोटे चमकीले सितारे उसमें बिखरे हुए थे। जिसे देखना बेहद अच्छा लग रहा था और सामने हिमालय की चोटियों में भी चांद की रोशनी पड़ रही थी पर हिमालय बहुत साफ नहीं था इस समय। हम लोग कुछ देर यूहीं टहलते रहे। ठंडी बहुत ज्यादा बढ़ने लगी थी इसलिये हम अपने कमरे में वापस आ गये।

बिनसर सेंक्च्यूरी की एक खास बात और है कि यहां बिजली नहीं है रैस्ट हाउस की तरफ से दो मोमबत्तियां कमरे में रहती है पर हम अपने साथ खूब मोमबत्तियां लेकर गये थे जिन्हें हमने करे में हर जगह जला दिया। रात के समय सन्नाटा इतना अधिक बढ़ गया कि थोड़ा अजीब भी लग रहा था पर अच्छा भी था। लेकिन ठंडी से तो बुरा हाल था उस पर हमें पता चला की यहां आग जलाने की भी मनाही है सो हमारे पास एक ही रास्ता था कि बिस्तर में घुस जायें और गप्पें मारें। 8 बजे रात के भोजन का समय था। सो हम लोग भोजन करने डाइनिंग हॉल आ गये। इस समय डाइनिंग हॉल पूरा भरा हुआ था और कोई संदेह नहीं है कि सबसे ज्यादा बंगाली ही थे जिन्होंने भोजन को लेकर सैकड़ों सवाल पूछे और ये भी कहा कि क्या उन्हें माछू भात नहीं मिल सकता। पर रैस्ट हाउस में शायद शाकाहरी भोजन ही मिलता था सो उनकी फरमाईश पूरी नहीं हो पाई। इस समय यहां पर उम्मीद से कई गुना ज्यादा ठंडी थी और बिजली न होने के हमारा रात्रि भोजन कैंडिल लाइट डिनर की तरह ही रहा। भोजन कर लेने के बाद हम कमरे में वापस लौट आये और गप्पें मारते-मारते सो गये।

जारी...

Friday, March 5, 2010

मेरी बिनसर अभ्यारण्य की यात्रा - 1

मेरी बिनसर अभ्यारण्य की यह यात्रा 30 दिसम्बर 2006 की है। जब हम कुछ दोस्तों ने नये साल में बिनसर अभ्यारण्य जाने की प्रोग्राम बनाया और वहां के टी.आर.सी. में बुकिंग भी करवा ली। हममें से तीन नैनीताल के थे और दो ने दिल्ली से नैनीताल आना था और फिर उसी दिन हम सब ने बिनसर के लिये निकलना था। हमारा इरादा था कि 7 बजे सुबह हम बिनसर के लिये निकल जायेंगे पर हुआ बिल्कुल इसके उलट क्योंकि जिन लोगों ने दिल्ली से आना था वो हल्द्वानी से नैनीताल आते समय ट्रेफिक में ऐसे फंसे कि 9 बजे सुबह नैनीताल पहुंच पाये।

कम से कम पहुंचे तो क्योंकि जिस तरह से अचानक ही इन दिनों नैनीताल में भीड़ बढ़ जाती है उसे देख कर तो लगता है अगर नैनीताल नहीं होता तो लोग नया साल मनाने पता नहीं कहां जाते ? इतनी भीड़ और इतनी गाड़िया जो कि जहां-तहां अटकी हुई थी। अपना नैनीताल ही परदेश सा लग रहा था। खैर हम ने जाने के लिये टैक्सी वाले से बात की पर आज तो कोई टैक्सी वाला भी खाली नहीं था। सब पैसा कमाने में व्यस्त थे। इसलिये हमने बस से जाने का फैसला किया।

बिनसर अभ्यारण्य अल्मोड़ा से आगे पड़ता है इसलिये अल्मोड़ा तक तो हमें जाना ही था पर इस समय अल्मोड़ा के लिये कोई भी बस हमें नैनीताल से नहीं मिली सो यह सोच कर कि भवाली तक बस से चले जाते हैं और उसके आगे के लिये भवाली जा कर देंख लेंगे, हम बस में चढ़ गये। बस लगभग भरी हुई थी। हम सबको बैठने के लिये अलग-अलग जगहों पर सीटें मिली। उसके कुछ देर बाद ही पूरी बस खचाखच भर गई। लोग एक ऊपर एक चढ़े हुए थे। जिसमें की बहुत से ऐसे थे जो रोज़ाना काम के लिये भवाली जाते हैं और बहुत से भवाली के आस-पास के गांव के थे और कुछ हमारे जैसे भी थे जो नया साल मनाने के मूड से यात्रा कर रहे थे। कुल मिलाकर गाड़ी में तिल रखने को भी जगह नहीं थी और लोगों को इस बात पर गुस्सा था एक इस तरह के मौकों पर सरकार कुछ अतिरिक्त बस सेवा क्यों नहीं शुरू करती ? ताकि इस परेशानी से कुछ तो बचा जाये। खैर कुछ देर में बस चलने लगी। हमें कुछ पता नहीं था कौन कहां पर है। बस में लोगों के हल्ले की आवाजें और कंडक्टर के टिकट के लिये चिल्लाने की आवाजें ही सिर्फ कानों में पड़ रही थी। लगभग आधे घंटे बाद हम भवाली पहुँच ही गये।

हमें लगा था कि भवाली पहुंच के हमें आसानी से वाहन मिल जायेगा पर ऐसा हुआ नहीं। भीड़ के चलते यहां भी सारे टैक्सी वाले व्यस्त थे और स्टेशन में जाकर देखा तो वहाँ भी हमें कोई बस नहीं मिली। बड़ी मुश्किल से एक टैक्सी वाला तैयार हुआ चलने के लिये पर उसने भी कह दिया कि वो सिर्फ अल्मोड़ा तक ही जायेगा। अल्मोड़ा से आगे जाने के लिसे हमें वहीं से कोई टैक्सी करनी होगी। उसकी बात मानने के अलावा हमारे पास उस समय और कुछ नहीं था सो हम लोग टैक्सी में अल्मोड़ा चले गये।

अल्मोड़ा को जाते हुए वही जाना पहचाना रास्ता नज़रों के सामने था। अकसर ही ऐसा होता है कि जब भी पहाड़ों में कहीं जाना हो तो कुछ जगहें ऐसी है जिनसे होकर गुजरना ही होता है ऐसा ही कुछ अल्मोड़ा के साथ भी हैं। बहुत सी जगहों तक पहुंचने के लिये अल्मोड़ा प्रवेश द्वार की तरह है। जिसमें से गुज़रना ही होता है। अल्मोड़ा वाले रास्ते में भी बहुत ज्यादा ट्रेफिक था। हम लोग जैसे ही कैंची मंदिर के पास पहुंचे ही थे कि हमारी एक दोस्त ने बोला कि उसे कुछ बेचैनी सी महसूस हो रही है। उसकी बात सुनकर हम लोग चौंक गये क्योंकि हमारी टीम में किसी को भी इस तरह की परेशानी नहीं हुई थी। खैर टैक्सी वाले ने थोड़ी देर के लिये गाड़ी रोक दी और उसे बोला कि - मैडम एक हरी मिर्च खा लो सब ठीक हो जायेगा। मैडम भी एक्सपेरिमेंट करने में पीछे तो रहने वाले थी नहीं सो पूरी की पूरी हरी मिर्च चबा भी दी। आंखों से आंसू तो निकल आये मैडम के पर बेचैनी दूर नहीं हुई।

हममें सब ही इस मामले में बिल्कुल अनाड़ी थे क्योंकि कभी किसी के साथ ऐसा हुआ नहीं था पर टैक्सी वाला भला था सो उसने टैक्सी की स्पीड थोड़ी कम कर दी और बीच-बीच में अपने घरेलू इलाज भी बताता गया जिनको फिर माना नहीं गया। जब आधे से भी ज्यादा रास्ता ऐसे ही बीत गया तो हम लोग एक चाय की दुकान में चाय पीने के लिये यह सोच कर रुक गये कि शायद उसे थोड़ा आराम मिल जाये। यहीं हमने उससे पूछा कि - आखिर हुआ क्या जो उसे इस तरह की बेचैनी हो रही है। उसने बताया कि - नैनीताल से आते समय बस में उसके पास जो सज्जन खड़े थे उनके कपड़ों से तेज़ गंध आ रही थी जो सीधा उसकी नाक में जा रही थी, उसके बाद से ही उसे ऐसी बेचैनी होने लगी। हम कुछ समय उस दुकान में बैठक रहे और चाय पी। उसकी बेचेनी भी थोड़ी कम होने लगी थी। थोड़ा और समय उस जगह पर बिताने के बाद हम आगे बढ़ गये। अल्मोड़ा पहुंचते हुए हमें हल्की सी झलक हिमालय की दिखी।

कुछ देर बाद टैक्सी वाले ने हमें बस स्टेंड छोड़ दिया और बताया कि यहाँ से बिनसर अभ्यारण्य के लिये टैक्सी ले लो और टैक्सी वालों को 450 से 500 रुपये तक ही देना। इनका इतने तक का ही रेट है। उसकी इस छोटी सी टिप ने हमारे अच्छे खासे रुपये बचा दिये थे। क्योंकि जब हमने आगे जाने के लिये टैक्सी की बात की तो हमें सबसे पहले टैक्सी वाले ने ही 800 रुपये बोल दिया। सुन के हमारे होश उड़ गये। खैर उससे हम लोग बहस ही कर रहे थे कि पीछे से दूसरे टैक्सी वाले ने कहा कि वो हमें 650 रुपये में छोड़ देगा। हमने मना कर दिया तो एक टैक्सी वाला आया उसने हमसे पूछा कि हम उसे कितने रुपय देंगे। हमने बोला 450 रुपया मात्र। उसने थोड़ी देर के लिये कुछ सोचा और फिर बोला ठीक है आप 500 रुपया दे देना। हम लोग काफी थक चुके थे और 500 रुपया कुछ ज्यादा भी नहीं लगा इसलिये उसकी टैक्सी में हम बैठ गये...

जारी...