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Tuesday, November 17, 2009

प्रेम के बारे में एक भी शब्द नहीं

विरेन डंगवाल जी के नये कविता संग्रह `स्याही ताल´ का लोकापर्ण नैनीताल फिल्म फैस्टविल में हुआ था। प्रस्तुत है उसी संग्रह से एक कविता



प्रेम के बारे में एक भी शब्द नहीं

शहद के बारे में
मैं एक शब्द भी नहीं बोलूँगा

वह
जो बहुश्रुत संकलन था
सहस्त्र पुष्प कोषों में संचित रहस्य रस का

जो न पारदर्शी न ठोस न गाढ़ा न द्रव
न जाने कब
एक तर्जनी की पोर से
चखी थी उसकी श्यानता
गई नहीं अब भी वह
काकु से तालु से
जीभ के बीचों-बीच से
आँखों की शीतलता में भी वह

प्रेम के बारे में
मैं एक शब्द भी नहीं बोलूँगा।


- विरेन डंगवाल






Monday, April 27, 2009

क्या रखा है मेरे नाम में तेरे लिये ?

आज फिर अपनी डायरी से अलेक्जेंडर पूश्किन की एक कविता लगा रही हूं। इस कविता के अनुवादक हैं कुमार कौस्तुभ

क्या रखा है मेरे नाम में
तेरे लिये ?

खत्म हो जायेगा मेरा नाम भी
जैसे, दूर समुद्र के किनारों से टकराती
लहरों का दुख भरा शोर
जैसे रात में सुनसान जंगल में
कोई आवाज़।

छोड़ जायेगा वह
इस यादगार पन्ने पर
एक बेजान निशान
जैसे किसी कब्र पर
अनजानी भाषा में गढ़ी गई इबारत।

क्या है उसमें ? क्या रखा है
बड़ी देर से
नयी विद्रोही व्याकुलताओं में ?
नहीं दे पायेंगी ये
तेरे दिल को कोमल, साफ यादें।
किंतु, बुरे दिनों में, एकांत में
दुख से लेना वह नाम,
कहना : मेरी याद अभी है
संसार में जिंदा है वह दिल
जहां जी रही हूं मैं.....




Wednesday, March 25, 2009

जहां दरिया बहता है

आज फिर अपनी डायरी के पन्नों में दर्ज एक कविता मिली जो वियतनामी कवि वो कू ने लिखी है। वो कू को वियतनाम में युद्ध का विरोध करने के कारण लम्बे समय तक कारवास में रहना पड़ा जहां इन्होंने अनगिनत यातनायें झेली। वो कू के शहर क्वांग त्री सिटी को कई बार युद्ध झेलना पड़ा।
अपने इसी शहर के लिये वो कू ने यह कविता लिखी।


एक बहुत दूर की दोपहर

जब दरिया अपने किनारे लांघ गया था,

उस स्मृति के साथ पहुंचा

मैं अपने शहर, जो तुम्हारा और मेरा शहर था

चमकता है मेरे मन में वही स्विर्णम दिन

तुम्हारा गोल सफेद टोप, उस संकरी गली में

दोपहर की रोशनी में चमक रहा था

तुम्हारी जामुनी फ्राक, हवा में उड़ते लम्बे बाल

और चर्च की लगातार आवाजें लगाती, हज़ारों बार

बजती घंटिया याद आयी मुझे।

वह शहर जो पूरा बरबाद हो गया था युद्ध में

उस शहर की हर गली एक दर्द की तरह

उभरती है मेरे ज़हन में।

मेरा कोई हिस्सा हर गिरती हुई पंखरी के साथ

गिरता है धरती पर

उन चमकदार फूलों का आर पार

दर्द की तरह लहराता हुआ गिरता है धरती पर।

लेकिन मेरे सपनों में वो शहर अछूता है,

बरबादी के पहले सा अछूता

जब गलियां जिन्दा थी, बलखाती लहरों की तरह

जब तुम्हारी सिम्त खिलने से पहिले गुलाब जैसी थी

जब तुम्हारी आंखें तारों की तरह सुलगती थी।

कैसी तेज याद आती है उन बहते पानियों की।

सर्दी की कमजोर रोशनी में कैसी दीखती थी तुम

जब लम्बी घास दरिया के दूसरे किनारे

पर झुका होता था।

हमारे पुराने शहर से अब भी भरा है हमारा होना

मेरे बाल पक गये हैं उस नदी किनारे घास की तरह

या तुम्हारे इतने पुराने प्यार की तरह।

Wednesday, February 11, 2009

सच्चा प्यार

नोबेल पुरस्कार विजेता पोलिश कवयित्री विस्वावा शिम्बोर्स्का की कविता के कुछ अंश.......

.....भला दुनिया के लिये वे दो व्यक्ति किस काम के
जो अपनी ही दुनिया में खोये हों ?
बिना किसी खास वजह के
एक ही ज़मीन पर आ खड़े हुए हैं ये दोनों,
किस अदृश्य हाथ ने लाखों-करोड़ों की भीड़ से उठाकर
अगर इन्हें पास-पास रख दिया
तो यह महज़ एक अंधा इत्तिफाक था,
लेकिन इन्हें भरोसा है कि इनके लिये यही नियत था।
कोई पूछे कि किस पुण्य के फलस्वरूप ?
नहीं, नहीं, न कोई पुण्य था, न कोई फल.....

....क्या ये सभ्यता के आदर्शों को तहस-नहस नहीं कर देगी ?
अजी, कर ही रही है।

देखो, किस तरह खुश हैं दोनों,
कम-से-कम छिपा ही लें अपनी खुशी
हो सके तो थोड़ी सी उदासी ओढ़ लें
अपने दोस्तों की खातिर ही सही। जरा उनकी बातें तो सुनो
हमारे लिये अपमान और उपहास के सिवा क्या है ?
और उनकी भाषा ?
--कितनी संदिग्ध स्पस्टता है उसमें !
और उनके उत्सव, उनकी रस्में,
सुबह से शाम तक फैली हुई उनकी दिनचर्या !
--सब कुछ एक साज़िश है पूरी मानवता के खिलाफ।

हम सोच भी नहीं सकते क्या से क्या हो जाये
अगर सारी दुनिया इन्हीं की राह पर चल पड़े!
तब धर्म और कविता का क्या होगा ?
क्या याद रहेगा, क्या छूट जायेगा
भला कौन अपनी मर्यादाओं में रहना चाहेगा !.....

.....सच्चा प्यार ?
मैं पूछती हूं क्या यह सचमुच इतना जरूरी है ?
व्यावहारिकता और समझदारी तो इसी में है
कि ऐसे सवालों पर चुप्पी लगा ली जाए
जैसे ऊंचे तबकों के पाप-कर्मों पर खामोश रह जाते हैं हम,


जिन्हें कभी सच्चा प्यार नहीं मिला
उन्हें कहने दो कि
दुनिया में ऐसी कोई चीज होती ही नहीं,
इस विश्वास के सहारे
कितना आसान हो जायेगा
उनका जीना और मरना।

Sunday, January 18, 2009

एक यात्री

आज कम्प्यूटर में अपनी पुरानी फाइलों को देखते हुए मुझे यह कविता मिली। जो मैंने किसी पत्रिका या अखबार से लिखी थी।

डेविस लेबर्टोव की लिखी इस कविता का हिन्दी अनुवाद चन्द्र प्रभा पाण्डेय द्वारा किया गया है।


अगर रथ और पैरों में चुनाव करना हो

तो मैं पैरों को चुनूंगी

मुझे रथ की उंची गद्दी पसंद है

उसकी ललकारती रफ्तार, दुस्साहसपूर्ण हवा,

जिसकी तेज गति को पकड़ पाना मुश्किल है

परन्तु मैं जाना चाहती हूं,

बहुत दूर,

और मैं उन रास्तों पर चलना चाहती हूं

जहां पहिये नहीं जा सकते

और मैं नहीं चाहती हमेशा रहना

घोड़ों और साज सामान के बीच

खून, झाग और धूल।

मैं उनके विचित्र सम्मोहन से अपने को मुक्त

करना चाहती हूं,



मैं यात्रा में पैरों को एक

अवसर देना चाहती हूं।