Saturday, January 22, 2011

मेरी पिथौरागढ़ यात्रा - 3

भाटकोट से वापस आकर कुछ देर आराम कर अपने दोस्त की दुकान में चली गयी। इस समय बाजार में काफी हलचन दिखने लगी थी। लोग अपनी रोजाना की जिन्दगी में व्यस्त होने लगे थे। जब दुकान पहुंची उस समय मेरे दोस्त के डैडी भी दुकान में ही थे। मेरी कुछ देर उनके साथ बातें हुई और फिर मैं बाजार की चहल-पहल देखने के लिये निकल आयी। इस समय इस चैराहे में सब्जी और फलों की दुकानें लगी हुई थी। ये सब देखना एक अलग ही एहसास देता है। इस समय तो दुकानें भी खुल चुकी थी। हालांकि ये दुकानें बहुत बड़ी-बड़ी नहीं हैं पर फिर भी इनमें जरूरत का सारा सामान मिल जाता है। मैं पूरा एक चक्कर इस रास्ते में फिर से गयी। सुबह यहां बिल्कुल सन्नाटा पसरा हुआ था पर इस समय उतनी ही चहल-पहल थी। मैं जब दुकान वापस लौटी तब तक मेरा दोस्त भी अपने काम निपटा चुका था। उसके बाद मैंने उसके डैडी से विदा ली और हम लोग निकल गये। आज हमें गुफा देखने के लिये जाना था।



पर उससे पहले कुछ काम निपटाने थे सो इसी बहाने मुझे पिथौरागढ़ की अलियों-गलियों में झांकने का भी मौका मिल गया और इन्हीं अलियों-गलियों से होते हुए हम नवल दा की दुकान पहुंचे। पहले नवल दा भी हमारे साथ आने वाले थे पर फिर उन्होंने कहा कि वो शाम को टेªकिंग में साथ चलेंगे। आज हमें फिर कल वाले ही रास्ते पर जाना था। सुबह के समय हल्की सी धुंध पूरी घाटी में बिखरी हुई लग रही थी हालांकि मौसम काफी गरम था। इस समय इस रास्ते से पिथौरागढ़ एक अलग ही मूड में नजर आ रहा था। कुछ देर बाद हम लोग भगवान दा की दुकान में पहुंच गये। वहां पहुंचने पर हम वहीं से थोड़ी दूरी में छड़ा गांव की ओर निकल गये जहां से हिमालय का नजारा भी अच्छा लगता है और गांव भी काफी अच्छा है। यहां से वाकय में नजारा बहुत अच्छा था। गांव कुछ ऐसा लग रहा था जैसे हिमालय की आगोश में सिमटा हुआ हो। कुछ देर यहां फोटोग्राफी करने के बाद हम वापस आ गये। लौटते हुए हमें रास्ते में भीमशिला दिखी जो पहले काफी बड़ी थी पर अब टूट गयी है। इस गांव को जाने वाला रास्ता भी बेहद खूबसूरत है।



जब हम लोग वापस दुकान पहुंचे भगवान दा ने पीने के लिये छांछ दी। उस समय छांछ की जरूरत भी थी क्योंकि आज सुबह से ही मुझे पानी की कुछ ज्यादा ही प्यास लग रही थी। फ्रिज में रखी होने के कारण मैंने अपनी छांछ बाद में पीने के लिये रख दी। भगवान दा की दुकान में एक युवक बैठा था जो पेशे से पंडित था और उसे कहीं शादी करवाने भी जाना था। वो एक फालतू विषय पर मेरे दोस्त से उलझ गया और शास्त्रों का ज्ञान बिखेरने लगा। जब हमने उसे अपने लाॅजिक बता दिये तो बेचारा खिसियाते हुए बोला - अगर में इस पूरे विधि-विधान से शादी करवाउं तो एक दिन में एक शादी भी नहीं हो पायेगी और मुझे तो एक दिन में दो-तीन शादियां करवानी होती हैं। एक बार फिर अपने धर्म के नियम-कायदों पर हमें हंसी आ गयी जिन्हें अपनी जरूरत के अनुसार जब जैसे चाहे बदल सकते हैं।

खैर हम लोग वहां से गुफा देखने निकल गये। गुफा जाने के लिये हमने थोड़ा रास्ता गाड़ी से तय किया और फिर उसके बाद गाड़ी रास्ते में खड़ी कर हम एक जंगल की ओर निकल गये। यहां पर थोड़ी ठंडी लगी क्योंकि जंगल बेहद घना था और पाला गिरा होने के कारण बेहद ठंडा हो रहा था। हमने करीब आधा किमी. का रास्ता इस जंगल के बीच से तय किया। जब हम गुफा के पास पहुंचे तो उसके अंदर जाने का रास्ता देख कर ही मैं तो बेहद उत्साहित हो गयी। पहले हमने तय किया था कि सब अंदर जायेंगे पर भगवान दा ने कहा कि उन्हें बहुत ठंड लग रही है इसलिये वो बाहर खड़े रहेंगे।

यह गुफा अभी कुछ समय पहले ही मिली है। आर्कियोलाॅजिकल वालों ने इसे अपने अधिकार में ले रखा है और इसकों ठीक करवाने का काम उनके द्वारा ही किया जाना है। पर फिलहाल अभी यह गुफा बिल्कुल उसी हालत में है जिस हालत में मिली थी। जब हम इसके अंदर गये जमीन बिल्कुल कीचड़ से भरी हुई थी और पानी थोड़ा ठंडा लग रहा था। जब हम गुफा के पहले स्ट्रैच में पहुंचे ही थे कि एक चमगादड़ महाशह लटके हुऐ दिखायी दिये जो हमसे बेफिक्र सोया हुआ था। उसे उसकी बेफिकरी के साथ छोड़ कर हम आगे बढ़ गये। गुफा का पहला स्ट्रेच हमने लगभग घुटनों के बल चलते हुए तय किया। गुफा के अंदर बेहद अंधेरा था इसलिये हम अपने टाॅर्च साथ में लेकर गये थे और उन्हीं से रोशनी कर रहे थे। इसके आगे का काफी लम्बा स्ट्रैच हमने आधा झुक कर पार किया। हर जगह पर यह डर बना हुआ था कि कहीं सर किसी नुकीले पत्थर से न टकरा जाये या हमारे कैमरे दिवारों से न टकरा जायें। इसके आगे का तीसरा स्ट्रैच हमने खड़े-खड़े तय किया पर यह रास्ता इतना पतला था कि चलने में परेशानी हो रही थी पर क्योंकि हम पतले दुबले प्राणी हैं तो आसानी से रास्ता पार कर गये।। मैंने अपने दोस्त से कहा भी कि - पतले होने के फायदे तो बहुत होते हैं। खैर गुफा के अंदर मौसम एकदम बदल गया था। यहां बिल्कुल ठंड नहीं थी और पानी भी थोड़ा गर्म लग रहा था। जब हम गुफा के अंतिम छोर पर पहुंचे वहां पानी का कुड दिखा। हम इस कुड से दूर ही रहे क्योंकि इसमें फूल चढ़े हुए दिखायी दिये। गुफा की दिवारों पर कैल्सियम की पपड़िया जमी हुई थी। इस गुफा के अंदर हालांकि अभी कुछ साफ नहीं है पर गहराई से देखने पर लगा की प्राचीन देवी-देवताओं की मूर्तियां बनी हुई हैं। मेरी अपनी समझ के अनुसार मुझे शिव और देवी की मूर्तियों के से नमूने भी इसमें दिखायी दिये।

  कुछ देर तक हम लोग गुफा को देखते रहे और हर एंगिल से फोटो लेते रहे। इस समय बिल्कुल ऐसा लग रहा था जैसे हम डिस्कवरी का कोई प्रोग्राम कर रहे हैं जिसकी रिसर्च के लिये यहां आये हुए हों। खैर झूठा ही सही पर वो अहसास भी अपने आप में रोमांचित कर देने वाला था। कुछ समय बाद हम उसी तरह वापस लौट आये जिस तरह अंदर गये थे। बाहर लौटते हुए मैंने चमकादढ़ के कुछ तस्वीरें उसे परेशान किये बगैर ले ली। गुफा के बाहर एक पानी की टंकी बनायी है जिसमें अंदर के कुंड का पानी आकर जमा होता है। हमने यहां यह पानी पिया अपने हाथ-पैर धोये जो कि बुरी तरह कीचढ़ में सने हुए थे। उसके बाद जंगल का रास्ता तय करते हुए गाड़ी तक आये और फिर दुकान वापस आ गये। (फिलहाल मैं इस गुफा की तस्वीरें नैट पर नहीं लगा सकती हूं।)


 वापस आकर छांछ पी और खाना बनने तक तय किया कि हम पास में ही मोस्टमानूं के मंदिर जायेंगे। कहा जाता है कि मोस्टमानूं भगवान कुमाउं के राजा थे। यहां एक मेले का आयोजन भी होता है। इस मंदिर के अंदर जाते हुए बाहर प्रांगण में विशाल झूला टंगा हुआ है। इस झूले से गंगोलीहाट का नजारा दिखायी देता है। हालांकि यह एक प्राचीन मंदिर है पर अब इसे पूरी तरह आधुनिक कर दिया गया है जो इसकी प्राचीनता को कहीं से भी नहीं दिखाता है। जब मैंने पहले दिन भी इस मंदिर के गेट को देखा था तो मुझे लगा था कि शायद कोई रिजाॅर्ट होगा पर बाद में पता चला कि मोस्टमानू का मंदिर यही है। मैं इस मंदिर के अंदर अकेले ही गयी और अच्छे से इस मंदिर को देखा और बात का दुःख होता रहा कि हमारी अपनी चीजों को हम खुद ही कितनी आसानी से छोड़ के आधुनिकता के रंग में रंग जाते हैं। इस मंदिर के अंदर शिव की मूर्ति स्थापित है। मुझे तो वह मूर्ति भी प्राचीन नहीं लगी खैर थोड़ा उदासी के साथ हम वापस दुकान आये। जहां हमारे लिये आलू-गोभी की सब्जी और पूरी इंतजार कर रहे थे। खाना खाने के बाद हम वापस लौट लिये क्योंकि अभी हमें एक ट्रेकिंग के लिये भी निकलना था...

जारी...

Wednesday, January 12, 2011

मेरी पिथौरागढ़ यात्रा - 2

मुझे लगा था कि पिथौरागढ़ में काफी ठंडी होगी पर यहां का मौसम नैनीताल के मौसम से कहीं ज्यादा अच्छा और सुहावना था। पिथौरागढ़ की समुद्रतल से उंचाई 4,967 फीट है। मैंने कुछ देर आराम किया और फिर हम लोग 4.30 बजे के लगभग पिथौरागढ़ के पशुपतिनाथ मंदिर की ओर निकल गये जो चंडाक वाली साइड में पड़ता है। यहां से शाम के समय हिमालय का नजारा काफी अच्छा दिखायी देता है। यहां जाते हुए पिथौरागढ़ का काफी अच्छा नजारा दिखायी दिया। इस जगह से पिथौरागढ़ को देखने में लगा कि वाकय पिथौरागढ़ बहुत खूबसूरत जगह है। हम करीब आधे घंटे में पहुंच गये थे। 

जिस समय हम पहुंचे उस समय थोड़ा अंधेरा सा होने लगा था पर फिर भी हिमालय में अच्छी रोशनी पड़ रही थी इसलिये कुछ अच्छे शाॅट्स मिल गये। पहले हमारा इरादा था कि पशुपतिनाथ मंदिर के अंदर से फोटो लेंगे पर इस समय मंदिर बंद हो चुका था। यहां से शोर घाटी का नजारा भी बिल्कुल साफ दिखायी दे रहा था। पिथौरागढ़ का इलाका शोर घाटी में आता है। मेरे दोस्त ने बताया कि यह कप के आकार का है इसलिये यहां मौसम अच्छा ही रहता है। कुछ समय यहां बिताने के बाद हम हमारे एक दोस्त के पहचान के भगवान दा की दुकान में आये।
भगवान दा के खेत में एक गुफा अभी कुछ समय पहले ही निकली है जिसे देखने के लिये हमने कल का दिन तय किया क्योंकि इस समय काफी अंधेरा हो गया था। भगवान दा ने जाते ही हमें खाने के लिये शहद दिया। इस शहद की खास बात यह थी कि इसमें शहद के साथ मोम भी मिला हुआ था जो कि खाने में ऐसा लग रहा था जैसे कि मुंगफली को बारिक टुकड़ों में पीस कर मिलाया गया हो। खैर कुछ समय दुकान में बिताने के बाद हम लोग वापस पिथौरागढ़ की ओर आ गये।
 रास्ते में आते समय हम पर्यावरण पार्क में रुके। यहां से रात के समय पिथौरागढ़ का बहुत अच्छा नजारा दिखायी देता है। जिस समय हम यहां पर पहुंचे बिल्कुल अंधेरा हो गया था और पिथौरागढ़ रोशनी में डूबा हुआ दिखायी दे रहा था। जिसे देखना अपने आप में एक अद्भुत अहसास था। हालांकि इस समय हल्की सी ठंडी भी होने लगी थी पर नैनीताल के मुकाबले मुझे तो मौसम अच्छा लग रहा था। कुछ समय हमने यहां से रोशनी में नहाये पिथौरागढ़ के फोटो लिये और फिर एक जगह पर आकर बैठ गये। आसमान बिल्कुल साफ था और आसमान में छोटे-छोटे तारे हीरों के टुकड़ों की तरह बिखरे हुए थे। जिसे देखना मेरा पसंदीदा काम है। काफी समय तक हम नजरें गढ़ाये तारों को देखते रहे। हल्की सी ठंडी होने के बावजूद भी उस शाम में ऐसा कुछ था जो हमें वहीं बांधे हुए था। हालांकि मैं अकसर तारों भरा आसमान देखती हूं पर उस दिन जो बात थी वो पहले कभी महसूस नहीं हुई। तारों के बीच से कभी-कभी सैटेलाइट गुजरता हुआ भी दिख रहा था जिसे देख कर टूटते हुए तारे का सा अहसास हो रहा था। कुछ देर वहीं बैठे रहने के बाद आखिरकार हमें वापस आना ही पड़ा क्योंकि अंधेरा गहराता जा रहा था। हम गाड़ी में बैठे और वापस लौट लिये। वापस लौटने के बाद हमने कुछ देर गप्पें मारी और बातों ही बात मैं मेरा अगली सुबह अकेले ही भाटकोट जाने का प्लान बन गया।

सुबह करीब 5.30 बजे मैं उठी। मौसम में हल्की सी ठंडक थी। मैं अकेले ही भाटकोट की ओर निकल गयी। सुबह के समय पिथौरागढ़ में न के बराबर हलचल थी। सब्जी वाले अपनी आढ़त लगाने की तैयारी कर रहे थे। बाजार बिल्कुल सुनसान था। कोई-कोई दुकान वाले ही दुकानों को खोलने की तैयारी कर रहे थे। कुछ सफाई कर्मचारी सफाई करने में लगे थे। मैं गांधी चैक होते हुए सिलथाम चैराहे की ओर पहुंची और वहां से आगे भाटकोट की ओर निकल गयी। मुझे बताया गया था कि भाटकोट से भी हिमालय का अच्छा नजारा दिखायी देता है और पिथौरागढ़ भी एक दूसरे ही मूड में दिखता है।

मैं सड़क के रास्ते आगे निकल गयी। इस समय माॅर्निंग वाॅक करते हुए काफी लोग नज़र आ रहे थे। पिथौरागढ़ अब काफी आधुनिक शहर हो गया है। यहां पुराने जमाने के मकानों के निशान कम ही दिखे। ज्यादातर मकान आधुनिक स्टाइल के ही दिखे। यहां अपर जिलाधिकारी जैसे लोगों के मकान और कार्यालय ज्यादा दिखायी दिये। मुझे लगा कि शायद यह पुलिस क्षेत्र भी था क्योंकि पुलिस कार्यालय और पुलिस आॅफिसर्स के भी काफी मकान इस इलाके में दिखायी दे रहे थे और जगह भी काफी साफ-सुथरी और अच्छी लग रही थी। अब सूर्योदय हो गया था पर काफी चलने के बाद भी जब मुझे हिमालय नजर नहीं आया तो मैंने एक बच्ची से रास्ता पूछा। उसने बताया कि मैं सही रास्ते पर हूं थोड़ा आगे जाने पर मुझे हिमलाय दिखायी दे जायेगा। वो बच्ची स्कूल ड्रेस में थी और इतनी सुबह शायद ट्यूशन पढ़ने जा रही होगी। खैर कुछ देर चलने के बाद में मुख्य पाइंट पर पहुंच भी गयी।
जब मैं यहां पर पहुंची तो एक आदमी एक बच्चे की बुरी तरह शिकायत कर रहा था और कह रहा था कि - इसने इस जगह इतनी शराब की बोतलें इकट्ठा करके रखी हैं और स्कूल जाने के बहाने यह यहां आकर मटरगश्ती करता है और जब मैंने इसे डांठा तो मुझे कहता है ‘अबे मास्टर तुझे तो मैं देख लूंगा।’ गुस्से में भुनभुनाते हुए कुछ देर बाद वो शिक्षक महोदय वहां से चले गये और माहौल में कुछ शांति आयी। वैसे उन शिक्षक महोदय का गुस्सा तो जायज था खैर मैं जिस तरह का हिमालय देखने की उम्मीद कर रही थी वो नजारा मुझे नहीं मिल पाया क्योंकि मुझे पहुंचने में थोड़ी देरी हो गयी पर फिर भी काफी अच्छे शाॅट्स मिल गये। कुछ समय इस जगह पर बिताने के बाद मैं वापस लौट गयी। मुझे वो सुबह वाली लड़की इस समय भी मिली और उसने मुझसे पूछ भी लिया था कि - दीदी आपको वो जगह मिल गयी थी ? 
जब मैं बाजार के इलाके में पहुंची तो रास्तों को लेकर थोड़ा गड़बड़ा गयी इसलिये कुछ लोगों से रास्ता पूछना पड़ा। इस सब में हुआ कुछ यूं कि मैं पहुंच तो गयी पर सुबह के समय जिस गांधी चैक से आयी थी वो रास्ता इस समय नहीं था। इस समय मैं किसी दूसरे ही रास्ते से वापस लौटी पर जो भी था मेरी सुबह बहुत अच्छी बीती...

जारी...

Wednesday, January 5, 2011

मेरी पिथौरागढ़ यात्रा - 1

मेरा पिथौरागढ़ जाने का इरादा काफी पहले से बना था पर हमेशा कुछ न कुछ अड़चन आ जाती और मेरा जाना अटक जाता था। वैसे ऐसा मेरे साथ अकसर ही होता है कि जब अच्छे से प्लान बनाओ तो चैपट हो जाता है और फिर अचानक ही ऐसा कुछ हो जाता है कि जाना तय हो जाता है। ऐसा ही कुछ इस बार भी हुआ। नैनीताल से मुझे अकेले जाना था और बांकि दोस्त मुझे पिथौरागढ़ पर ही मिलने वाले थे।

हमेशा की तरह मैंने बस से जाना तय किया इसलिये सुबह कड़कड़ाती ठंडी में 6.30 बजे बैग लेकर स्टेशन पहुंच गयी। जब मैं स्टेशन पहुंची तब तक बस खचाखच भर गयी थी। एक पल तो ऐसा लगा कि जैसे इस बार भी जाना संभव नहीं हो पायेगा पर फिर मैंने अपने लिये बोनट पर बैठने की जगह बना ली। यह जगह अच्छी तो नहीं थी पर बांकी के लोग जिस हाल में थे उनके मुकाबले कहीं बेहतर थी। यहां पर बैठने का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि सामने का नजारा साफ-साफ दिखायी दे रहा था। इस बार की बारिश के बाद यह मेरी पहली यात्रा थी इसलिये मुझे सड़कों की हालत साफ नज़र आ रही थी जो पूरी तरह तबाह हो गयी थी। नैनीताल-भवाली सड़क भी कई जगहों पर टूटी हुई थी। वो तो आर्मी ने अपने पुल बना रखे हैं इसलिये काम चल रहा था। एक बात जो मुझे बेहद अखर रही थी वो ये कि सरकारी बस के खचाखच भरे होने के बावजूद भी बस में बिल्कुल सुनसानी थी जिसकी मुझे बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी।

खैर भवाली पहुंचने पर बस कुछ देर रूकी। कुछ यात्री और चढ़ गये जो रोज के ही थे और आसपास के गांवों में जाने वाले थे इसलिये ड्राइवर ने उन्हें बस में चढ़ा लिया। उनके चढ़ने से पहले से ही खड़े यात्रियों के लिये मुसीबतें और बढ़ गयी पर मैं काफी अच्छी जगह में थी। भवाली अब हमें अल्मोड़ा जाना था और फिर वहां से पिथौरागढ़। कुछ आगे आने पर कोसी नदी ने हमारा साथ देना शुरू कर दिया। इस समय कोसी इतनी शांत दिख रही थी कि कोई यकीन भी नहीं कर सकता था कि यही वो नदी है जिसने बरसात में इतना विकराल रूप रखा कि इतनी ऊंचाई तलक आकर लोगों के घरों और इतनी बड़ी सड़क का वजूद तक मिटा दिया। इस सड़क में सबसे ज्यादा तबाही हुई थी। सड़क के आसपास बने हुए कई मकान और दुकानों का तो अभी तक भी कुछ पता नहीं चला और बहुत से मकानों की छतें टेड़ी हो गयी। बहुत से मकान और दुकानें तो अब मात्र ढांचे की तरह खड़े हैं। सड़कों की हालत भी इतनी ही बुरी थी। यह पता नहीं चल पा रहा था कि गाड़ी सड़क पर से जा रही है या मिट्टी के ढेर के ऊपर से। कहीं सड़कें नदी ने काट दी तो कहीं सड़कों में ऊपर से पहाड़ कट कर आ गये। मैंने अपने मोबाइल से कुछ तस्वीरें लेने की कोशिश की पर चलती गाड़ी से तस्वीरें इतनी अच्छी नहीं आईं।




9ः18 बजे हम अल्मोड़ा पहुंचे। यहां गाड़ी कुछ देर रुकी। कुछ यात्री अल्मोड़ा में उतरे इसलिये मुझे एक सीट मिल गयी। जितनी सवारियां उतरी उससे ज्यादा बस में चढ़ गयी इसलिये बस की हालत में अभी भी कोई फर्क नहीं आया। जब ड्राइवर ने बस को स्टार्ट किया तो बस अटक गयी। उसने बोला - बस में धक्का लगाना पड़ेगा। यह अनुभव मेरे लिये नया था। खैर मैंने तो धक्का नहीं लगाया पर कुछ उत्साही लोग धक्का लगाने उतर गये। बस थोड़ा आगे-पीछे होती और फिर रुक जाती। ड्राइवर ने आगे झांक कर देखा तो कुछ अति उत्साही बस को आगे से पीछे की ओर धक्का लगा रहे थे। जब उन्होंने पीछे से जाकर धक्का लगाया तो बस ने स्टार्ट हो गयी। अल्मोड़ा से मौसम थोड़ा गर्म हो गया था पर मेरी सीट से मुझे कुछ दिखायी नहीं दे रहा था और मेरी बगल में जो सज्जन बैठे हुए थे वो वैसे तो अच्छे थे पर बेहद वाचाल थे और उनके बोलने पर उनके मुंह से गुटखे का जो भभका आ रहा था उसने मुझे परेशान कर दिया था। मन हुआ कि वापस बोनट में ही जाकर बैठ जाऊं पर वो जगह घिर चुकी थी। खैर बाड़ेछीना, धौलादेवी जैसे गांवों से होते हुए जब हम पनुवानौला पहुंचे तो मुझे फिर से आगे वाली सीट मिल गयी। जो मेरे लिये हर मायने में वरदान ही थी। यहां से नजारा भी दिख रहा था और गुटखे के भभखे से भी निजात मिल गयी। रास्ते में कई छोटे-छोटे गांव पड़ रहे थे और सड़क के किनारे दो-चार पहाड़ीनुमा दुकानें भी मिल जाती।

इसके बाद हम दन्या पहुंचे। मैंने दन्या के आलू के पराठों की काफी चर्चा सुनी थी इसलिये सोच लिया था कि  यहां आलू के पराठे ही खाउंगी पर आलू के पराठे खाने पर मुझे ऐसा कुछ खास नहीं लगा जो स्पेशल हो। ऐसे पराठे तो सब जगह ही मिलते हैं खैर जो भी हो पर इस रैस्टोरेंट के सामने एक गोलू देवता का मंदिर था। मेरा मन था उसमें जाने का पर समय न मिल पाने के कारण मैं जा नहीं पाई। यहां गाड़ी करीब आधा घंटा रुकी और फिर एक धक्का लगाने के बाद आगे बढ़ गयी।

12 : 53 मिनट पर बस ध्याड़ी पहुंची। ध्याड़ी वो जगह है जहां बरसात ने सबसे विकराल रूप दिखया था और ये पूरा गांव बुरी तरह बर्बाद हुआ था। यहां की बुरी तरह टूटी सड़कें अभी भी इस बात की गवाही दे रही थी। कई जगहों में तो बस लगभग आधी नीचे की ओर ही झुक जा रही थी। यहां से आगे निकल जाने पर एक जगह बस थोड़ी देर के लिये रुकी और जब चलने लगी तो एक सवारी कम थी। जब कन्डक्टर ने उसके साथ वाले से पूछा तो उसने जवाब दिया - उसका सिक्किम ब्रांड टूट गया और वो उसे लेने के लिये उतर गया। मुझे लगा कि सिक्कम ब्रांड शायद यहां की कुछ खास चीज होगी इसलिये मैंने भी तय कर लिया था कि पिथौरागढ़ में मिलेगी तो मैं खरीदूंगी पर पिथौरागढ़ पहुंचने पर विशेषज्ञों ने मुझे सिक्किम ब्रांड की मतलब बताया तो मुझे अपने फैसले के ऊपर बहुत हंसी आई और मैंने अपना इरादा बदल लिया।

खैर इस जगह ड्राइवर-कन्डक्टर में कुछ कहासुनी हो गयी। कन्डक्टर के एक पहचान वाले को पिथौरागढ़ से आगे कहीं जाना था इसलिये उसने ड्राइवर को बोला - गाड़ी तेज चलाना और बीच में कहीं किसी भी सवारी के लिये गाड़ी नहीं रोकना। इस बात पर ड्राइवर ने कहा - मैं इतनी जल्दी पहुंचा देता हूं फिर भी ऐसे बोलते हो और यह बस यहां के लोगों के लिये ही है इसलिये मैं हर सवारी को उठाउंगा। जिसे जो करना है करे। इसके बाद ड्राइवर ने बस की स्पीड भी कम कर दी। हम करीब 2 बजे घाट पहुंचे जहां से पिथौरागढ़ की सीमा शुरू हो जाती है। रास्ते से हिमालय का अच्छा नजारा दिख रहा था। यहां नदी पर कुछ परियोजनायें भी चल रही थी।



कुछ आगे जाने पर हम एक जगह पहुंचे गुरुना। यहां सड़क के किनारे पाषाण देवी या गुरना देवी का मंदिर है। ऐसा कहा जाता है कि पहले इस जगह पर बहुत दुर्घटनायें होती थी। बाद में किसी के सपने में आया कि देवी का मंदिर बनाओ। उसके बाद यहां पर देवी की स्थापना की गयी। तब हमेशा हर गाड़ी इस जगह पर थोड़ी सी देर के लिये रुकती जरूर है।


इसके बाद का रास्ता काफी अच्छा था पर ड्राइवर की स्पीड कम करने से मुझे बहुत नुकसान हो रहा था। मेरे दोस्त के लगातार फोन आ रहे थे कि - कितनी देर लगेगी ? अभी कहां है ? मैंने ड्राइवर से पूछा कि - हम किस जगह हैं तो उसने कहा - घाट से थोड़ा ऊपर। फिर बोला - वैसे मैं अभी तक पिथौरागढ़ पहुंचा देता पर कन्डक्टर ने जिस तरह मुझसे बात की मुझे गुस्सा आ गया इसलिये मैंने जानबूझ कर गाड़ी की स्पीड कम कर दी।

मैं लगभग 3.30 बजे पिथौरागढ़ पहुंची। स्टेशन मैं मेरे दोस्त मुझे लेने के लिये आये हुए थे उनके साथ मैं जहां रुकना था उस जगह चली गयी।

जारी...