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Tuesday, May 4, 2010

पेशावर कांड के नायक थे चन्द्र सिंह गढ़वाली


चन्द्र सिंह गढ़वाली का जन्म 25 दिसम्बर 1891 में हुआ था। चन्द्रसिंह के पूर्वज चौहान वंश के थे जो मुरादाबाद में रहते थे पर काफी समय पहले ही वह गढ़वाल की राजधानी चांदपुरगढ़ में आकर बस गये थे और यहाँ के थोकदारों की सेवा करने लगे थे। चन्द्र सिंह के पिता का नाम जलौथ सिंह भंडारी था। और वह एक अनपढ़ किसान थे। इसी कारण चन्द्र सिंह को भी वो शिक्षित नहीं कर सके पर चन्द्र सिंह ने अपनी मेहनत से ही पढ़ना लिखना सीख लिया था।

3 सितम्बर 1914 को चन्द्र सिंह सेना में भर्ती होने के लिये लैंसडौन पहुंचे और सेना में भर्ती हो गये। यह प्रथम विश्व युद्ध का समय था। 1 अगस्त 1915 में चन्द्रसिंह को अन्य गढ़वाली सैनिकों के साथ अंग्रेजों द्वारा फ्रांस भेज दिया गया। जहाँ से वे 1 फरवरी 1916 को वापस लैंसडौन आ गये। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ही 1917 में चन्द्रसिंह ने अंग्रेजों की ओर से मेसोपोटामिया के युद्ध में भाग लिया। जिसमें अंग्रेजों की जीत हुई थी। 1918 में बगदाद की लड़ाई में भी हिस्सा लिया।

प्रथम विश्व युद्ध समाप्त हो जाने के बाद अंग्रेजो द्वारा कई सैनिकों को निकालना शुरू कर दिया और जिन्हें युद्ध के समय तरक्की दी गयी थी उनके पदों को भी कम कर दिया गया। इसमें चन्द्रसिंह भी थे। इन्हें भी हवलदार से सैनिक बना दिया गया था। जिस कारण इन्होंने सेना को छोड़ने का मन बना लिया। पर उच्च अधिकारियों द्वारा इन्हें समझाया गया कि इनकी तरक्की का खयाल रखा जायेगा और इन्हें कुछ समय का अवकास भी दे दिया। इसी दौरान चन्द्रसिंह महात्मा गांधी के सम्पर्क में आये।

कुछ समय पश्चात इन्हें इनकी बटैलियन समेत 1920 में बजीरिस्तान भेजा गया। जिसके बाद इनकी पुनः तरक्की हो गयी। वहाँ से वापस आने के बाद इनका ज्यादा समय आर्य समाज के कार्यकर्ताओं के साथ बीता। और इनके अंदर स्वदेश प्रेम का जज़्बा पैदा हो गया। पर अंग्रेजों को यह रास नहीं आया और उन्होंने इन्हें खैबर दर्रे के पास भेज दिया। इस समय तक चन्द्रसिंह मेजर हवलदार के पद को पा चुके थे।

उस समय पेशावर में स्वतंत्रता संग्राम की लौ पूरे जोरशोर के साथ जली हुई थी। और अंग्रेज इसे कुचलने की पूरी कोशिश कर रहे थे। इसी काम के लिये 23 अप्रेल 1930 को इन्हें पेशावर भेज दिया गया। और हुक्म दिये की आंदोलनरत जनता पर हमला कर दें। पर इन्होंने निहत्थी जनता पर गोली चलाने से साफ मना कर दिया। इसी ने पेशावर कांड में गढ़वाली बटेलियन को एक ऊँचा दर्जा दिलाया और इसी के बाद से चन्द्र सिंह को चन्द्रसिंह गढ़वाली का नाम मिला और इनको पेशावर कांड का नायक माना जाने लगा।

अंग्रेजों की आज्ञा न मानने के कारण इन सैनिकों पर मुकदमा चला। गढ़वाली सैनिकों की पैरवी मुकुन्दी लाल द्वारा की गयी जिन्होंने अथक प्रयासों के बाद इनके मृत्युदंड की सजा को कैद की सजा में बदल दिया। इस दौरान चन्द्रसिंह गढ़वाली की सारी सम्पत्ति ज़प्त कर ली गई और इनकी वर्दी को इनके शरीर से काट-काट कर अलग कर दिया गया।

1930 में चन्द्रसिंह गढ़वाली को 14 साल के कारावास के लिये ऐबटाबाद की जेल में भेज दिया गया। जिसके बाद इन्हें अलग-अलग जेलों में स्थानान्तरित किया जाता रहा। पर इनकी सज़ा कम हो गई और 11 साल के कारावास के बाद इन्हें 26 सितम्बर 1941 को आजाद कर दिया। परन्तु इनके में प्रवेश प्रतिबंधित रहा। जिस कारण इन्हें यहाँ-वहाँ भटकते रहना पड़ा और अन्त में ये वर्धा गांधी जी के पास चले गये। गांधी जी इनके बेहद प्रभावित रहे। 8 अगस्त 1942 के भारत छोड़ों आंदोलन में इन्होंने इलाहाबाद में रहकर इस आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई और फिर से 3 तीन साल के लिये गिरफ्तार हुए। 1945 में इन्हें आजाद कर दिया गया।

22 दिसम्बर 1946 में कम्युनिस्टों के सहयोग के कारण चन्द्रसिंह फिर से गढ़वाल में प्रवेश कर सके। 1957 में इन्होंने कम्युनिस्ट के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा पर उसमें इन्हें सफलता नहीं मिली। 1 अक्टूबर 1979 को चन्द्रसिंह गढ़वाली का लम्बी बिमारी के बाद देहान्त हो गया। 1994 में भारत सरकार द्वारा उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया गया। तथा कई सड़कों के नाम भी इनके नाम पर रखे गये।

Monday, September 7, 2009

ऐसे भी लोग होते हैं - ४

गौरा देवी - उत्तराखंड में चिपको आंदोलन की अगुवा

उत्तराखंड में चिपको आंदोलन को शुरू करने का श्रेय गौरा देवी को ही जाता है। यदि उस समय गौरा देवी ने अपनी कुछ महिला साथियों के साथ इस आंदोलन की शुरूआत न कि होती तो शायद आज चिपको आंदोलन भी नहीं होता। गौरा देवी की इस पहल के बाद चिपको आंदोलन को उत्तराखंड के बाहर भी कई राज्यों में जंगलों को बचाने के लिये चलाया गया और साथ ही विश्व स्तर पर भी जंगलों को बचाने की मुहीम में तेजी आयी।

जनवरी 1974 में रैंणी गांव में सरकार द्वारा जंगलों की निलामी का आदेश दिया गया था। जिसमें इस गांव के लगभग 2451 पेड़ों की नीलामी होनी थी। परंतु गांव के लोगों द्वारा घोर इसका भारी विरोध किया गया जिसके चलते इस नीलामी को रोकना पड़ा। 15, 23 मार्च 1974 को इस नीलामी के विरोध में किये गये प्रदर्शनों के बावजूद भी इलाहाबाद के ठेकेदारों के मजदूर जंगल काटने के लिये वन विभाग के कर्मचारियों के साथ मिलकर रैंणी गांव पहुंच गये।

यह सूचना गौरा देवी को मिली तो उन्होंने अपने जंगलों को बचाने का निर्णय लिया और गांव की अन्य महिलाओं और बच्चों को लेकर जंगल की ओर चली गयी। गौरा देवी ने मजूदरों से कहा कि - यह जंगल हम सबका है। इससे हमें घास-पत्ती, हवा-पानी मिलते हैं। अगर इन्हें काट दिया तो बाढ़ भी आयेगी जिसमें हमारे खेत बह जायेंगे और हम सब बर्बाद हो जायेंगे।

उनके ऐसा कहने पर ठेकेदार के मजदूरों ने उन्हें वापस धमकाना शुरू कर दिया और कहा - यदि वो हमें पेड़ नहीं काटने देंगी तो उनको सरकारी काम रोकने के जुर्म में बंद करवा दिया जायेगा। पर गौरा देवी इससे डरी नहीं उन्होंने अपनी अन्य महिला साथियों के साथ पुरजोर विरोध जारी रखा। इससे परेशान होकर ठेकेदार के आदमी ने बंदूक दिखाकर गौरा देवी समेत अन्य महिलाओं से कहा - यदि तुम लोग यहां से नहीं हटे तो तुमको गोली मार दी जायेगी। यह सुन कर गौरा देवी ने बेखौफ़ होकर ठेकेदार को जवाब दिया - मार लो हमें गोली। इसके बाद मजूदर वहां से वापस लौट गये। ठेकेदार के आदमियों ने गौरा देवी को डराने-धमकाने की बहुत कोशिश की पर वो अपनी में जिद डटी रही जिस कारण रैंणी गांव बर्बाद होने से बच गया।

इस घटना का शासन पर इतना गहरा असर पड़ा कि तत्काल एक जांच समिति बनायी गयी जिसमें अलकनंदा समेत अन्य नदियों के जल को बचाने एवं जंगलों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया और इसके लिये कई सकारात्मक निर्णय लिये गये जिसके चलते जंगलों में दिये जाने वाले ठेकों को समाप्त कर दिया गया और वन निगम की स्थापना की गई। गौरा देवी द्वारा शुरू किये गये इस एक आंदोलन ने रैंणी गांव को विश्व स्तर पर ख्याती दिला दी और गौरा देवी इस आंदोलन की अगुवा थी। इसके बाद जल-जंगल-जमीन को बचाने के लिये विश्व स्तर पर प्रयास शुरू किये गये। जंगलों के प्रति उन्होंने जो एक नई चेतना का संचार लोगों में किया और जंगलों को बबार्द होने से बचाया था इसके चलते उन्हें वृक्ष मित्र पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। गौरा देवी स्वयं अनपढ़ थी पर उन्होंने चमोली के ग्रामीण क्षेत्रों में प्राइमरी और हाईस्कूल खुलवाने में बहुत अहम भूमिका निभाई।

गौरा देवी का जन्म 1925 के लगभग चमोली के लाता गांव की भोटिया जनजाति में हुआ था। इनके पिता का नाम नारायण सिंह था। गौरा देवी जब गौरा देवी मात्र 11 वर्ष की ही थी तब ही इनका विवाह रैंणी गांव के मेहरबान सिंह के साथ हो गया। इनका परिवार जीविकोपार्जन के लिये भेड़-बकरियां पालता था, ऊन का व्यापार करता था और थोड़ी बहुत खेती किया करता था। विवाह के कुछ साल पश्चात ही गौरा देवी के पति का देहांत हो गया और परिवार की पूरी जिम्मेदारी गौरा देवी के ऊपर आ गयी। उस समय गौरा देवी का पुत्र मात्र ढाई साल का था। 4 जुलाई 1991 को गौरा देवी ने दुनिया से विदा ली।



Saturday, July 25, 2009

जिम कॉबेंट का जन्म दिन है आज


25 जुलाय 1875 को नैनीताल में जन्मे जिम कॉबेंट को मात्र एक शिकारी मानना उनके साथ अन्याय होगा। उनके व्यक्तित्व के कई ऐसे पहलू हैं जो उन्हें शिकारी की जगह प्रकृतिप्रेमी, उत्कृष्ठ लेखक, बेहतरीन खिलाड़ी तथा वन्य जीवन को फोटोग्राफी द्वारा कैद करने वाला बनाते हैं। उन्होंने छ: अविस्मरणीय किताबें लिखी - माई इंडिया, जंगल लॉर, मैन ईटर ऑफ कुमाऊँ, मैन इटिंग लेपर्डस ऑफ रूद्रप्रयाग, टैम्पल टाइगर, ट्री-टॉप। मैन ईटर ऑफ कुमाऊँ की अमेरिका से 536,000 प्रतियाँ प्रकाशित हुई थी। उनकी सभी किताबों का कई अन्य भाषाओं में भी अनुवाद किया गया है।

जिम स्वयं को खुशकिस्मत मानते थे कि वह कुमाऊँ में पैदा हुए। यहाँ की बोली और रीति रिवाज की उन्हें अच्छी जानकारी थी। जिम यहाँ के अंधविश्वासों में भी विश्वास रखते थे और शकुन-अपशकुन मानते थे। अपनी किताब `माई इंडिया´ में उन्होंने इस परिवेश को सजीव ढंग से प्रस्तुत किया है। वह ग्रामीणों से पहाड़ी भाषा में बात करते थे और यहाँ के स्थानीय भोजन को पसंद करते थे। लोगों के साथ उनका व्यवहार आत्मीयतापूर्ण था। उनके दु:ख सुख में जिम हमेशा साथ देते थे और जरूरत पड़ने पर मित्र की तरह सलाह भी देते थे। लोग उन्हें `कार्पेट साहिब´ कहकर सम्बोधित करते थे।

जिम बचपन से ही प्रकृति के नजदीक रहे और हमेशा जंगलों और वन्य प्राणियों के बारे में कुछ न कुछ सीखते रहते थे। अकसर वह जंगलों में घूमने निकल जाते थे। अपनी अच्छी याददाश्त, तीव्र सुनने और विलक्षण अवलोकन क्षमता के कारण जंगल की छोटी बड़ी बात से भली भांति परिचित थे। अपनी पुस्तक `जंगल लॉर´ में उन्होंने अपने यही अनुभव लिखे हैं। वह जानवरों की आवाजों को बड़े ध्यान से सुनते और बाद में उनको जस का तस दोहराते थे। उन्होंने सिर्फ नैनीताल में ही 256 चिड़ियों की पहचान की थी जिन्हें वो उनकी बोली सुनकर ही पहचान लेते थे। जिम नैनीताल को पक्षी-विहार के रूप में विकसित करना चाहते थे पर उनके इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया गया। नैनीझील में उन्होंने ही सबसे पहले महासीर मछली को डाला था। उन्होंने मछलियों के शिकार के लिये कुछ जगहें सुनिश्चित की तथा रात को मछलियों को मारने पर प्रतिबंध भी लगाया।


जिम लम्बे समय तक नगरपालिका के वरिष्ठ उपाध्यक्ष पद पर भी रहे और अपने शहर को आदर्श शहर बनाने के लिये हमेशा प्रयासरत रहे। अपने शीतकालीन आवास के दौरान जिम कालाढूंगी के अपने घर से नैनीताल पैदल ही आते थे और शाम को उसी से वापस भी जाते थे। कभी कभी वह घोड़े का भी इस्तेमाल करते थे। वह मार्ग आज भी एक अच्छे ट्रेकिंग रूट के रूप में विकसित हो सकता था पर अब उसे काफी जगह में सीमेंट वाला बना दिया गया है। कालाढूंगी वाले उनके निवास को अब कॉबेंट म्यूजियम के रूप में विकसित कर दिया गया है जिसमें कॉबेंट की सभी चीजों को सहेज के रखा गया है। नैनीताल में जिम गर्नी हाउस में रहते थे। नैनीताल का शमशान घाट, भवाली की सड़क जिम की ही देने है।
एक जमाने में नैनीताल की शान माने जाने वाले बैण्ड स्टेंड का निर्माण जिम ने स्वयं के 4000 रुपय से करवाया था। एक समय में इसी बैंड स्टैंड में राम सिंह जी द्वारा बैंड बजाया जाता था जिसकी धुनों पर लोग पागलों की तरह झूमने लगते थे पर आज उसी बैंड स्टेंड को उस तरह से संजो कर नहीं रखा गया जिसका वो हकदार था। नैनीझील में पीने के पानी की जाँच करने वाली प्रयोगशाला का निर्माण भी जिम ने करवाया।
जिम खेलों के बहुत शौकीन थे। हॉकी और फुटबॉल उनके पसंदीदा खेल थे। नैनीताल में जब भी कोई मैच होता तो जिम उन्हें देखने जरूर जाते थे। नैनीताल के फ्लैट्स को स्टेडियम का आकार देने के लिये उन्होंने ही उसके चारों और सीढ़ियों का निर्माण करवाया। उन्होंने नैनीताल की प्राकृतिक सुन्दरता को बनाये रखने के लिये काफी नियम बनाये जैसे बकरियों द्वारा जंगलों को रहा नुकसान रोकने के लिये बकरियों और ट्रैफिक को नियंत्रित करने के लिये हाथ रिक्शा के लिये लाइसेंस बनवाना अनिवार्य किया।

शुरूआती दौर में कॉबेंट ने 23 वर्षों तक बिहार में नॉर्थ-वेस्ट रेलवे में फ्यूल इंस्पेक्टर के पद पर नौकरी की। नौकरी के दिनों को याद करते हुए वह कहते हैं कि - `नौकरी के दिन बहुत कठिन थे पर मैंने उनका पूरा आनन्द लिया´। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान वह वापस कुमाऊँ आ गये। वह नौकरी के समय से ही नरभक्षी जानवरों का शिकार करने लगे थे। 1907 में उनके द्वारा मारा गया पहला नरभक्षी चम्पावत का था जिसने अकेले ही 436 जानें ली थी। इसके बाद से जिम शिकारी के रूप में चर्चित हो गये। 32 साल के शिकारी जीवन में उन्होंने लगभग एक दर्जन नरभक्षी का शिकार किया था।

सन् 1930 से जिम ने शिकार को पूर्ण रूप से त्याग दिया और शिकार करने का नया तरीका इजाद किया। वो था कैमरे द्वारा जानवरों को कैद करना। उन्होंने साढ़े चार महीनों तक रात-दिन एक करके सात शेरों को अपने कैमरे में कैद किया और `सैवन टाइगर´ नाम से पहली मोशन पिक्चर का निर्माण किया।

जिम प्रकृतिविद भी थे और सिर्फ पेड़े लगाने को पर्यावरण नहीं मानते थे। उनका मानना था कि प्रकृति से जुड़ी हर चीज पर्यावरण का अनिवार्य अंग है वो चाहे जानवर हों या फिर मामूली सी घास-फूस। उन्होंने स्कूली बच्चों को प्रकृति के बारे में बताना शुरू किया ताकि प्रकृति के बारे में उनका ज्ञान बढ़े और वो इसके रक्षक बनें। वह बच्चों को शेर के दहाड़ने और पक्षियों की आवाजों की नकल करके भी दिखाते थे। उन्होंने वन्य प्राणियों की रक्षा के लिये कई संस्थान भी बनाये। भारत का पहला नेशनल पार्क जो रामनगर कुमाऊँ में स्थित है उसकी स्थापना जिम ने ही 1934 में की थी। जिसे उनके देहान्त के बाद उनकी याद में जिम कॉबेंट नेशनल पार्क का नाम दिया गया।

हिन्दुस्तान आजाद होने के पश्चात न चाहते हुए भी जिम 30 नवम्बर 1947 को केन्या (अफ्रिका) चले गये। पर वह निरन्तर पत्र व्यवहार किया करते थे जिनमें वो अपने मित्रों और यहाँ के लोगों के साथ बिताये खुशनुमा दिनों को याद करते थे और अपने वापस आने की इच्छा जाहिर करते थे लेकिन उनकी यह इच्छा कभी पूरी न हो सकी क्योंकि उससे पहले ही 16 अप्रेल 1955 को हार्ट-अटैक से उनका देहान्त हो गया। उनका अंतिम संस्कार केन्या में ही किया गया। जिम के अंतिम शब्द अपनी बहिन मैगी, जो हमेशा जिम के साथ ही रही, के लिये थे 'Make the world a happy place for other people to live'




Thursday, June 4, 2009

ऐसे भी लोग होते हैं - ३

स्व. श्री बंशीधर कंसल इस देश के ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे जिन्होंने देश की आजादी के लिये अपना सब कुछ लुटा दिया पर फिर भी वह हमेशा गुमनामी के अंधेरे में ही खोये रहे। बंशीधर कंसल का जन्म सन् 1916 में नैनीताल में हुआ और जीवन के अंत तक उनकी कर्मस्थली भी जिला नैनीताल ही रही। फिर भी उन्हें उनकी ही कर्मस्थली में कभी भी वो सम्मान मिल पाया जिसके वो हकदार थे।

बंशीधर को बचपन से ही स्वतंत्रता संग्राम का माहौल मिला। उनके पिता स्व. श्री बाबू राम कंसल भी स्वतंत्रता सेनानी थे और उनकी देखा-देखी बंशीधर भी इस आंदोलन में शामिल हो गये। जब वह 7वीं या 8 वीं कक्षा में नैनीताल के हमफ्री हाईस्कूल (वर्तमान में सी.आर.एस.टी. इंटर कॉलेज, नैनीताल) में पढ़ते थे तब ही उन्होंने अंग्रेजो के स्कूल में ही उनका विरोध करते हुए भारत का तिरंगा झंडा फहरा दिया। जिस कारण उन्हें स्कूल से निकाल दिया और उनकी पढ़ाई हमेशा के लिये रुक गयी पर उनकी किस्मत अच्छी थी कि उन्हें अंग्रेजों के खिलाफ सर उठाने के गुनाह में गोली नहीं मारी क्योंकि उस समय यह कोई मजाक नहीं था। यहाँ से उनका पूरा जीवन सिर्फ और सिर्फ देश की आजादी के लिये समर्पित हो गया। इसके बाद वो अकसर ही अंग्रेजों को नुकसान पहुंचाने के लिये कुछ ऐसा काम जरूर करते जिससे उनकी जान खतरे में पड़ जाती, जैसे कभी वो डांकबंगलों में तोड़फोड़ कर देते, संचार के तारों को काट देते जिससे ब्रिटिश फौज का आपसी संपर्क कट जाता या किसी गोरे के साथ उलझ पड़ते। इन सब में उनका साथ देने वाले उनके परममित्र स्व. श्री प्रेम सिंह बिष्ट, स्व. श्री पान सिंह नेगी व स्व. श्री हीरा लाल साह भी शामिल थे। बंशीधर बेहद क्रोधी स्वभाव के थे। बात-बात में मरने मारने के लिये तैयार रहते और कभी किसी की गलत बात सहन नहीं कर पाते।

उनकी इसी आदत के कारण उनके पिता बाबू राम कंसल उनको महात्मा गांधी जी के पास ले गये। तब गांधी जी नैनीताल आये थे और वहीं से भवाली जाने वाले थे। बाबू राम कंसल ने उन्हें गांधी जी से मिलाते हुए कहा कि `यह मेरा बेटा है बंशीधर। आजादी के लिये समर्पित है पर बहुत ही क्रोधी स्वभाव का है। कभी-कभी मुझे डर लगता है कि यह गलत रास्ते पर न चला जाये। इसलिये मैं इसे आपकी सेवा में लाया हूँ। आप ही बतायें मैं क्या करूँ ?´ गांधी जी ने शांत मुद्रा में हंसते हुए कहा कि `कम से कम डरपोक तो नहीं है अपने विरोध को खुल कर सामने तो रखता है। तुम इसे मेरे साथ वर्धा आश्रम भेज दो। मुझे पूरी उम्मीद है कि इसके स्वभाव में परिवर्तन जरूर आयेगा।´ उसके बाद बंशीधर कंसल गांधी जी के साथ वर्धा आश्रम चले गये और 2 साल तक वहीं पर रहे। वहाँ से उनकी गांधीवादी पढ़ाई की शुरूआत हुई। वर्धा आश्रम तब हर तरह के स्वतंत्रता से जुड़े आंदोलन का मुख्य गढ़ हुआ करता था। वहाँ पर रह कर बंशीधर कंसल ने गुस्से में काबू पाना तो सीखा ही साथ ही उनका देश के लिये समपर्ण भी बढ़ता चला गया। वर्धा आश्रम में उन्होंने देखा कि किसी तरह का कोई भेदभाव, छुआछूत नहीं है। वहाँ का नियम था कि जो उस दिन पाखाना साफ करता था वही रसोई भी बनाता था ताकि किसी के मन में काम को लेकर बड़े-छोटे की भावना घर न कर जाये। इस माहौल का बंशीधर कंसल के ऊपर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा और उन्होंने ताउम्र इस बात को अपने मन में बैठाकर रखा। जब बंशीधर कंसल वर्धा से वापस आये उनके स्वभाव में काफी बदलाव आ गया था और वह बेहद शांत हो गये थे परन्तु अपने विरोध को वह अभी भी खुल कर सामने रखते और सत्य के लिये हमेशा डटे रहते।
अब बंशीधर कंसल की स्वतंत्रता संग्राम में सक्रियता दिन-ब-दिन बढ़ती गयी और अंग्रेज उनसे इतने अधिक नाखुश हो गये कि उन्होंने उनको मोस्ट वांटेड बना दिया और उनके खिलाफ वारंट निकाल कर अंडर सेक्शन 129 डी.आई.आर. (डिफेन्स इंडिया रूल) के तहत उनको 27-07-1942 को गिरफ्तार कर लिया। उनका उस समय अंग्रेजों पर इतना अधिक आतंक था कि उनको पकड़ने के लिये आये थानेदार स्व. ईश्वरी दत्त जोशी ने उनको कपड़े तक बदलने की मौहलत नहीं दी और उनकी कनपटी में पिस्तौल रख कर सीधे गिरफ्तार कर बरेली जेल भेज दिया।

बरेली जेल में उनके साथ काफी विभत्स व्यवहार किया गया। उन्हें बहुत मारा-पीटा जाता और खाना भी ढंग से नहीं दिया जाता। जेल के दौरन ही वह मलेरिया से ग्रसित हो गये पर उनका इलाज नहीं किया गया। जेल में ही वह अपनी एक आंख की रोशनी भी हमेशा के लिये खो बैठे। इतने पर भी गोरों का अत्याचार उनके प्रति कम नहीं हुआ। हमेशा उन्हें प्रताड़ित करने के लिये नये-नये तरीके इस्तेमाल करते रहते। उन्हीं दिनों बरेली जेल में वहाँ के सुपरिटेंडेंट आने वाले थे। जेलर ने सभी कैदियों के लिये फरमान जारी किया था कि सबको उनके स्वागत में खड़े उठकर सलाम करना पड़ेगा। जब सुपरिटेंडट आये तब दूसरे कैदी तो खड़े हुए पर बंशीधर कंसल न तो खड़े हुए और न सलाम ही किया। जब जेलर ने उनसे गुस्से में कहा कि `तुमने हमारा हुक्म क्यों नहीं माना ?´ उन्होंने कठोर शब्दों में जेलर को कहा कि - `यदि मुझे तुम्हारा या तुम्हारे मालिकों का हुक्म ही मानना होता तो मैं जेल में नहीं होता।´ यह सुनकर जेलर का गुस्सा और ज्यादा बढ़ गया और उसने बंशीधर कंसल को अलग बैरक में डाल दिया। एक दिन जब जेलर ने उनको डांठते हुए कहा कि `मैं तुझे ऐसा सबक सिखाउंगा कि सारा आजादी की नशा उतर जायेगा।´ तब बंशीधर कंसल ने बैरक से ही हाथ निकाल कर जेलर का हाथ जोर से मरोड़ा और अंदर पड़े बर्तन की तरफ इशारा करते हुए कहा कि `मैं तेरी नाक इस बर्तन से काट कर फांसी में चढ़ना पसंद करूंगा।´ उस दिन के बाद से उन्हें लोहे की बेड़ियों में जकड़ दिया गया और बहुत ही अमानवीय व्यवहार किया गया। 06-11-1943 को जब इन्हें लगभग सवा साल के कारावास के बाद छोड़ा गया तो उनकी हालत मरणासन्न थी पर फिर भी वह आजादी के संग्राम में डटे रहे।

उनके परिवार का तब नैनीताल में बहुत शानदार कारोबार था पर सब स्वतंत्रता की आग में जल गया। अंग्रेजों ने इनके घर और व्यवसाय की कुर्की करवा दी। बंशीधर कंसल का पूरा परिवार रातों-रात सड़क पर आ गया। उसके बाद बंशीधर का पूरा परिवार भवाली में आकर बस गया। भवाली उस समय नैनीताल वालों का शमशान घाट हुआ करता था। यहाँ पर उन्होंने परिवार को पालने के लिये एक छोटी सी मिठाई की दुकान खोली। बाहर से तो ये मिठाई की दुकान थी पर इसमें नीचे एक भूमिगत कमरा बनाकर एक छापाखाना खोला था जिसमें उस समय के अनुसार साइक्लोस्टाइल मशीन लगायी थी। यहाँ से सारे स्वतंत्रता संग्राम संबंधित लेख तथा अन्य सर्कुलेशन हाथ से लिख कर छापे जाते फिर उसे सब जगह बांटा जाता। भवाली का उनका घर आजादी की बैठकों का मुख्य अड्डा ही बन चुका था। जो भी मीटिंग या प्लानिंग होती थी वो वहीं से होती। चूंकि परिवार के सारे पुरुष ही स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े थे इसलिये घर में सिर्फ महिलायें और बच्चे ही थे जिनको हमेशा ब्रिटिश फौज के दबाव में रहना पड़ता था। कई बार तो दुकान में काम करने वाले श्री मदन सिंह चिनवाल को गोरे सिपाही पकड़ कर बेरहमी से पीट भी देते थे।

बंशीधर कंसल एक बार सुभाष चन्द्र बोस से भी मिले, जब वह भवाली सेनेटोरियम में थे। उनसे मिल के वह उनको व्यक्तित्व से काफी प्रभावित हुए पर उनका झुकाव हमेशा गांधी जी की तरफ ही रहा। उन्होंने गांधी को अपनी अंतरात्मा में बसा कर रखा और अपनी अंतिम सांस तक भी उनसे अलग नहीं हुए। उन्होंने हमेशा ही खादी के वस्त्रों का उपयोग किया और गांधी टोपी के बगैर वह कभी घर से बाहर नहीं निकले।


बंशीधर कंसल उन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में से थे जिन्होंने अपने स्वतंत्रता सेनानी होने का भी कोई लाभ नहीं लिया। उनको मिलने वाली 25 एकड़ भूमि को भी लेने से उन्होंने मना कर दिया था। उनके संबंध राजनीतिक लोगों के साथ बहुत अच्छे थे। इंदिरा गांधी व फिरोज गांधी से उनके बहुत आतमीय संबंध रहे। आजादी के बाद हुए राजनीतिक ह्रास से वे बेहद दु:खी रहे और हमेशा यही कहते थे कि `हमने ऐसे राज के लिये लड़ाई नहीं लड़ी थी। हमने तो स्वराज के लिये इतना सब किया।´ बंशीधर कंसल को 15 अगस्त 1972 में स्वतंत्रता के 25 वें वर्ष के अवसर पर श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा ताम्र पत्र भी भेंट किया गया है। वो हमेशा अपने आदर्शों और सत्य के मार्ग पर अड़े रहे और 15 सितम्बर 1978 को इस दुनिया से विदा हो गये।




Saturday, May 9, 2009

ऐसे भी लोग होते हैं - 2

पिछली पोस्ट में मैंने अवस्थी मास्साब के बारे में लिखा था। इस पोस्ट में प्रस्तुत हैं उनके द्वारा बनाये कुछ पोस्टर और उनके द्वारा लिखी एक कविता


पुरानी धुनों में नई ध्वनि लगाकर
कैसेट का धंधा अजब चल रहा है।

गांधी व लोहिया के नामों को लेकर
असल में नकल का दखल चल रहा है।

कश्मीर की बर्फ शोले बनी है,
उत्तराखंड धू-धू कर जल रहा है।

बजाते हैं लॉबी में वे अपनी बंसी,
राग उनका अपना अलग चल रहा है।

नशे में उन्हें कुछ नज़र आयेगा क्या ?
जमीं चल रही, आसमाँ चल रहा है।

इलाही ज़रा उनकी आँखें तो खोल,
कि उनका सितारा किधर ढल रहा है।

- अवस्थी मास्साब

पोस्टर











साभार : श्री ज़हूर आलम
अध्यक्ष युगमंच नैनीताल




Wednesday, May 6, 2009

ऐसे भी लोग होते हैं - 2

अवस्थी मास्साब

अवस्थी मास्साब को यूं तो शायद ही कोई जानता हो क्योंकि उन्हें कभी किसी बड़े पुरस्कार से नहीं नवाजा गया और न ही अवस्थी मास्साब ने इसकी कभी कोई हसरत ही रखी। इसीलिये वो अपना काम चुपचाप करते रहे और लोगों को सही रास्ता दिखाते रहे।

2 अगस्त 1925 को नेपाल के एक छोटे से गावं सिलगढ़ी के गरीब परिवार में जन्मे शरत चन्द्र अवस्थी ने एम.ए. अंग्रेजी से किया था और नैनीताल के सी.आर.एस.टी. स्कूल में अंग्रेजी के शिक्षक थे। नैनीताल में हर कोई उन्हें अवस्थी मास्साब के नाम से ही जानता था। अवस्थी मास्साब वैसे तो अंग्रेजी के शिक्षक थे पर अंग्रेजी के अलावा भी हर विषय में उनका बहुत अच्छा एकाधिकार था। उनके छात्र रह चुके बलवीर सिंह जी का कहना है कि - हमारे क्लास में जब भी किसी और विषय के शिक्षक नहीं आते थे तो अवस्थी मास्साब उनकी जगह हमें पढ़ाने आते थे और इस अंदाज में वो पढ़ाते थे कि लगता ही नहीं था कि वो अंग्रेजी के ही शिक्षक हैं। अवस्थी मास्साब का हिन्दी, अंग्रेजी और उर्दू के अलावा अन्य भाषाओं की भी बहुत अच्छी जानकारी थी।

अवस्थी मास्साब को जो बात सबसे अलग करती है वो थी उनका स्वयं को अभिव्यक्त करने का माध्यम। जिसमें न तो उन्हें पैसों की जरूरत पड़ती थी, न ही बड़े-बड़े अखबार के संपादकों की खुशामद करने की और न ही ज्यादा समय की। उनका यह माध्यम था पोस्टर। वो उस समय की परिस्थितियों के अनुसार स्वयं ही पोस्टर बनाते थे और उसे अपने उपर लटका के सड़क में निकल जाते। जिसे भी पोस्टर पड़ना होता वो उनके सामने चले जाता। अवस्थी मास्साब वहां पर तब तक खड़े रहते थे जब तक की सामने वाला पूरा पोस्टर न पढ़ ले। कभी-कभी वो आगे-पीछे दोनों तरफ पोस्टर लटका के चलते थे। जब कोई सामने की तरफ वाला पोस्टर पढ़ लेता तो उसे घूम कर पीछे का पोस्टर भी पढ़ने देते। अवस्थी मास्साब के पोस्टरों की एक और खासियत यह थी कि उन्होंने कोई भी पोस्टर नये कागज में नहीं बनाया। इसके लिये उन्होंने हमेशा इस्तेमाल किये जा चुके कागज को ही फिर से इस्तेमाल किया। वो अपने दिल की हर बात, अपनी नाराजगी, गुस्सा और प्यार सब कुछ अपने पोस्टर के द्वारा आम जनता तक पहुंचा देते थे। जिसका जनता के उपर गहरा प्रभाव भी पड़ता था।
अवस्थी मास्साब नैनीताल की सबसे बड़ी नाट्य संस्था `युगमंच´ के संस्थापक सदस्य भी थे। ज़हूर आलम जी, अध्यक्ष, युगमंच की मल्लीताल स्थित छोटी सी कपड़े की दुकान `इंतखाब´ उनके बैठने का निश्चित स्थान था जहां से वो अपनी सभी रचनात्मक कार्यों को दिशा दिया करते थे। ज़हूर आलम जी का कहना है कि - अवस्थी मास्साब तो ज्ञान का भंडार थे। हर विषय में उनका ज्ञान इतना गहरा था कि कभी-कभी लोग उसे समझ भी नहीं पाते थे। असल में अवस्थी मास्साब अपने समय से बहुत आगे के थे इसलिये शायद लोग उन्हें उस तरीके से समझ नहीं पाये जिस तरह से उन्हें समझा जाना चाहिये था।
अवस्थी मास्साब आंदोलनकारी भी थे और उन्होंने `नशा नही रोजगार दो´, प्राधीकरण हटाओ नैनीताल बनाओ, मण्डल कमण्डल के विरुद्ध छात्र आंदोलन, 1994 का मुजफ्फरनगर कांड तथा उत्तराखंड आंदोलन में सक्रिय भूमिका अदा की।

इन सबके अलावा अवस्थी मास्साब खेलों के भी बेहद शौकिन थे और हर तरह के खेलों जैसे - क्रिकेट हॉकी, फुटबाल, बॉिक्संग आदि की प्रत्येक बारिकियों से भी भली भंति परिचित थे। अरूण रौतेला जी का कहना है कि - अवस्थी मास्साब विद्वान, ईमानदार तो थे ही लेकिन उन्होंने अपने को अभिव्यक्त करने का जो माध्यम चुना वो उन्हें सबसे अलग बनाता है। उनके बगैर नैनीताल आज भी अधूरा ही लगता है। उनसे हमें काफी कुछ सीखने को मिला। ऐसे विद्वान दुनिया में कम ही होते हैं जिनमें से एक हमारे अवस्थी मास्साब भी थे। 12 फरवरी 2002 को नैनीताल में उनका देहान्त ब्रेन हैमरेज से हुआ। कुछ समय से वह अस्पातल में भर्ती थे और जब उन्हें उनके बिस्तर से हटाया गया तो उनके द्वारा बनाया गया आखरी पोस्टर मिला, जिसमें लिखा था - हैप्पी बर्फ डे। क्योंकि एक दिन पहले ही नैनीताल में बर्फ पड़ी थी जिसकी खुशी भी उन्होंने अपने ही माध्यम से सबके सामने रखी और सबको अलविदा कह गये।

अवस्थी मास्साब के कुछ और पोस्टर अगली पोस्ट में...

अवस्थी मास्साब की तस्वीर और पोस्टर श्री ज़हूर आलम, अध्यक्ष `युगमंच´ से साभार




Tuesday, April 14, 2009

ऐसे भी लोग होते हैं

पिछली पोस्ट में मैंने बलवीर जी के बारे में लिखा था।

इस पोस्ट में प्रस्तुत हैं उनके कुछ छायाचित्र


































Monday, April 13, 2009

ऐसे भी लोग होते हैं

पिछली पोस्ट में मैंने बलवीर जी के बारे में लिखा था।

इस पोस्ट में प्रस्तुत हैं उनके कुछ छायाचित्र