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Monday, August 23, 2010

उत्तराखंड की तीर्थ यात्राओं में पड़ने वाला मुख्य पड़ाव है रुद्रप्रयाग





रुद्रप्रयाग उत्तराखंड की बद्ररीनाथ और केदारनाथ तीर्थ यात्राओं में पड़ने वाला मुख्य पड़ाव है। यह समुद्र तल से 610 मी. की उंचाई पर बसा हुआ है। भगवान रुद्रनाथ का मंदिर यहीं अलकनन्दा व मंदाकिनी के संगम में स्थित है। इसके अलावा शिव और शक्ति की संगम स्थली भगवती का मंदिर भी इस स्थान पर ही है।


महाभारत में इस स्थान को रुद्रावत नाम से जाना गया है। केदारखंड में इस स्थान के बारे में लिखा गया है कि - नारदमुनि ने एक पैर में खड़े होकर यहां शिव की तपस्या की थी। उसके बाद शिव ने उन्हें अपने रौद्र रूप के दर्शन दिये थे। शेषनाग के आराध्य देव शिव के इस स्थान पर अनेकों मंदिर हैं। ऐसा माना जाता है कि नागों ने इसी स्थान पर शिव की आराधना की थी और उनसे वरदान मांगा था कि शिव उन्हें अपना आभूषण बनायें।


संगम के लिये रुद्रप्रयाग स्टेशन से कुछ दूरी पर एक पैदल मार्ग जाता है। इस संगम स्थान पर श्रृद्धालु स्थान करते हैं और भगवान रूद्र के दर्शन करते हैं तथा शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं। यहां शिवलिंग के अलावा गणेश व पार्वती की मूर्तियां भी हैं।


रूद्रप्रयाग में एक संस्कृत महाविद्यालय भी है जिसे स्वामी सिच्चदानन्द जी ने बनवाया था। रुद्रप्रयाग के निकट ही एक स्थान है गुलाबराय। यह वह स्थान है जहां जिम कॉबेZट ने एक खतरनाक नरभक्षी बाघ को मारा था। जिसका उस समय इस इलाके में बहुत ही आतंक था। जिम कॉबेZट ने अपनी पुस्तक `मैन इटिंग लैपर्ड ऑफ रुद्रप्रयाग´ इसी बाघ के उपर लिखी थी।


रुद्रप्रयाग से 4 किमी. आगे कोटेश्वर महादेव का मंदिर पड़ता है। जिसके दर्शन का विशेष महत्व माना जाता है। यह मंदिर 20 फीट लम्बी गुफा में है जिसमें पानी प्राकृतिक रूप से टपकता रहता है। इस स्थान में सावन के प्रत्येक सोमवार और शिवरात्री के दिन मेले लगते हैं। इस स्थान से कुछ दूरी पर उमानारायण का मंदिर भी है।

Monday, August 9, 2010

पवित्र तीर्थस्थल है यमुनोत्तरी


जिस स्थान से यमुना नीचे आती है उस स्थान को यमुनोत्तरी कहा जाता है। यमुना का उद्गम कालिंदी पर्वत से माना जाता है। इसीलिये यमुना को कालिंदी नाम से भी जाना जाता है। केदारखंड के अनुसार माना जाता है कि - सूर्य की दो पत्नियां थी संज्ञा और छाया। संज्ञा ने गंगा को जन्म दिया तथा छाया ने यमुना व यमराज को। कहा जाता है कि छाया ने यमराज का तिरस्कार कर दिया था जिस कारण उन्हें पृथ्वी पर आना पड़ा। परन्तु सूर्य ने यमुना को भी पृथ्वी का उद्धार करने के लिये ही धरती पर भेजा। यमुनोत्तरी के विशाखयूप पर्वत पर पांडवों ने एक वर्ष बिताया था।

यमुनोत्तरी मंदिर यमुना के बांये तट पर स्थित है। इस मंदिर के कपाट वैशाख महीने कह शुक्ल पक्ष की अक्षय तृतीया को खुलते हैं और कार्तिक मास में आने वाली यम की द्वितीया को यह कपाट बंद हो जाता है। यमुनात्तरी के लकड़ी के मंदिर को 1885ई. में गढ़वाल के राजा सुदर्शनशाह ने बनवाया था और उसमें यमुना की मूर्ति की स्थापना करवाई। इस समय जो मंदिर यहां पर है इसे प्रतापशाह ने बनवाया था। इस मंदिर को सन् 1999 में एक बार फिर ठीक किया गया। मंदिर के गर्भ में एक सिंहासन है जिसमें काले रंग की यमुना व सफेद गंगा व सरस्वती की मूर्तियां रखी हैं। यमुनोत्तरी में पूजा करने वाले ब्राहम्ण ग्रहस्थ हैं और इन ब्राहम्णों को पूजा करने का अवसर बारी-बारी से मिलता है। ये ब्राहम्ण पीढ़ियों से मंदिर की पूजा करते आ रहे हैं।



इस मंदिर के पास एक गरम पानी का कुंड है जिसे सूर्यकुंड कहा जाता है। केदारखंड में इसे ब्रह्मकुंड नाम से भी जाना जाता है। इस कुड के पानी का तापमान 90 डिग्री सेल्सीयस के आसपास रहता है। इस कुंड में यात्री आलू, चावल को पोटली बनाकर डाल कर पकाते हैं और उसे ही प्रसाद माना जाता है। इस स्थान से कुछ दूरी पर एक कुंड और है जिसका नाम गौरीकुंड है। इसका पानी सूर्यकुंड से थोड़ा ठंडा है। इसमें यमुना का ठंडा पानी मिलता है जिस कारण इसके चारों ओर हर समय भाप का घेरा बना रहता है।

Tuesday, August 3, 2010

अपने मंदिरों के लिये विश्व प्रसिद्ध है जागेश्वर धाम

अल्मोड़ा से 34 किमी. दूर स्थित जागेश्वर धाम है जो अपने मंदिरों के लिये विश्व प्रसिद्ध है। जागेश्वर में जो मंदिर हैं ये 8वीं से 12 वीं शताब्दी के बीच बने हुए हैं। जागेश्वर के मंदिर अपने वास्तुकला के लिये बेहद प्रसिद्ध हैं। इन मंदिरों का निर्माण चन्द और कत्यूर वंश के राजाओं के द्वारा किया गया है। जागेश्वर धाम 124 मंदिरों का समूह है जिसमें हर आकार के मंदिर हैं। कुछ बहुत बड़े तो कुछ बहुत छोटे।

जागेश्वर में बेहद कई देवी-देवताओं की बेहद आकर्षक मूर्तियां हैं। शिव-पार्वती और विष्णु भगवान की मूर्तियां विशेष रूप से आकर्षक हैं। महामृत्युंजय और जागेश्वर भगवान के मंदिर सबसे प्राचीन मंदिर माने जाते हैं। जागेश्वर धाम से से पहले दंडेश्वर मंदिर पड़ता है। यहां पर काफी विशाल मंदिर हैं। इन मंदिरों की उंचाई लगभग 100 फुट तक है। इन मंदिरों के उपरी भाग में छत जैसी बनी हुई हैं जिनमें कलश रखे गये हैं।


महामृत्युंजय मंदिर में धातु का तांत्रिक यंत्र भी है। जागेश्वर धाम को भारत के 12 ज्योर्तिलिंगों में से एक माना जाता है। इन मंदिरों में पुष्टिदेवी, नवग्रह, सूर्य भगवान आदि देवी-देवताओं की मूर्तियां भी हैं। मंदिरों की बाहरी दिवारों में कुछ शिलालेख भी लिखे हैं पर इन्हें अभी तक भी पढ़ा नहीं जा सका है।

सावन के माह में यहां पर शिवजी की विशेष पूजा पार्थी पूजा कराने के लिये दूर-दूर से लोग आते हैं। पूरा माह शिव की पूजा की जाती है। इस दौरान एक छोटा सा बाजार भी मंदिर के बाहर लगाया जाता है।


जागेश्वर मंदिरों से लगा हुआ एक शमशान घाट भी है। यहां के लोगों का मानना है कि इसमें दाह संस्कार करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

इन्हीं मंदिरों से थोड़ी दूरी पर एक पुरात्व विभाग द्वारा संग्रहालय बनाया गया है जिसमें कई प्राचीन मूर्तियों का संरक्षण किया गया है।

Monday, July 26, 2010

अहम स्थान रहा है उत्तराखंड की लोक संस्कृति में शकुनाखरों का


उत्तराखंड की लोक संस्कृति में संगीत का एक अहम स्थान रहा है। यहां के लोक गीत, लोक गाथायें, वाद्य, नृत्य इत्यादि यहां के जीवन का अभिन्न अंग हैं। इन लोक गीत को जब यहां के परम्परागत वाद्यों हुड़का, बादी, औजी, मिरासी, डौर-थाली आदि के तान के साथ जब गाया जाता है तो अद्भुद समां बंध जाता है। यह लोकगीत जीवन के हर पहलू से जुड़े हुए हैं इसी आधार पर इनको कुछ भागों में विभाजित किया जा सकता है जैसे - संस्कार गीत, धार्मिक गीत, ऋतु गीत इत्यादि।



इन्हीं में से एक हैं संस्कार गीत। संस्कार गीतों में प्रमुख हैं शकुनाखर। इन गीतों को प्रत्येक शुभ कार्य जैसे - विवाह, जन्मोत्सवों, जनेउ तथा अन्य प्रकार के सभी शुभ कार्यों से पहले गाया जाता है। शकुनाखर का तात्पर्य होता है 'शगुन के अक्षर'। इन्हें गाने वाली ज्यादातर महिलायें ही होती हैं। इन शकुनाखरों में से कुछ इस प्रकार हैं


शकुना दे शकुना दे काज ए अति नीको


सो, रंगीलो, आंचलो कमलो का फूल


सोई फूल मोलावन्त व


गणेश, रामीचन्द्र, लछीमन, जीवा जनम


आधा अमरू होय।


सोई पाटो पैरी रैणा, सिद्धि बुद्धि सीता देवी


बहुराणी, आयुवन्ती पुत्रवंती होय।


अर्थात : शकुन के अक्षरों से शुभ कार्य की शुरूआत हो, इस रंगीले कपड़े के आंचल में कमल का फूल है, जिसके फलस्वरूप गणेश, राम, लक्ष्मण आदिअमरता की प्रतीक हैं। वही पट नई दुल्हन तुमने भी धारण किया है अत: तुम सीता की तरह सिद्धि बुद्धि आयुष्मती एवं पुत्रवती होओ।

इसी प्रकार जब प्राकृतिक शक्तियों की पूजा की जाती है तो उससे पहले मांगल गीत गाये जाते हैं जैसे -


जो जस देने कुर्म देवता, जो जस देने धरती माता।


जो जस देने खोली का गणेश, जो जस देने मोरी को नारैण


जो जस देने भूमि को भुग्याल, जो जस देने पंचनाम देवता


जो जस देने पितर देवता


तुमारी भाती मा यो कारिज वीर्यो, यो कारिज सुफल फल्यान


अर्थात : हे कुर्म देवता, धरती माता, गणेश देवता, नारायण देव, भूमि के दवेता, भुग्याल एवं पंचदेव, हे सभी पितृदेव, यह कार्य आपको ही समर्पित है आप ही इस कार्य को सफल करें।


इसी प्रकार अग्नि एवं गणपति के लिये भी गीत गाये जाते हैं।


यह गीत यहां की जीवनधारा में रचे बसे हुए हैं जिन्हें आज भी इनके मूल रूप में ही गाया जाता है।








Monday, July 19, 2010

कुमाऊँ का मुख्य पर्यटन स्थल है बैजनाथ

बैजनाथ अल्मोड़ा से 41 मील दूर स्थित है। इसको प्राचीन समय में वैद्यनाथ के नाम से भी जाना जाता है। वैजनाथ को कत्यूरी राजवंश के लोगों ने बसाया था। बैजनाथ के पास में ही सरयू नदी बहती है।



बैजनाथ के मुख्य मंदिर के पास ही केदारनाथ का मंदिर स्थित है। इस मंदिर में शिव की मूर्ति के साथ-साथ गणेश, ब्रह्मा, महिषमर्दिनी की मूर्तियां रखी हुई हैं। इस मुख्य मंदिर के चारों ओर 15 छोटे-छोटे मंदिरों का समूह है। यह मंदिर उत्तरीय शिखर शैली से बनाये गये हैं।


बैजनाथ के मुख्य मंदिर से कुछ दूरी पर सत्यनारायण, रकस देव तथा लक्ष्मी के मंदिर स्थित हैं। सत्यनारायण मंदिर की चर्तुभुजी विष्णु प्रतिमा खासी दर्शनीय है। इस मूर्ति को काले पॉलिशदार पत्थर से बनाया गया है। यह मूर्ति बहुत विशाल है।

बैजनाथ की कई मूर्तियों को अब केन्द्रीय पुरातन विभाग ने अपने पास संरक्षित कर लिया है। इन संरक्षित मूर्तियों में शिव-पार्वती की मूर्ति तथा ललितासन में बैठे कुबेर की मूर्ति हैं। इनके अतिरिक्त सप्तमातृका, सूर्य, विष्णु, माहेश्वरी, हरिहर, महिषमर्दिनी आदि की मूर्तियां हैं।



Thursday, July 15, 2010

कुमाऊँ का एक मुख्य पर्यटन स्थल है बागेश्वर


बागेश्वर कुमाऊँ का एक मुख्य पर्यटन स्थल है। यह नीलेश्वर और भीलेश्वर पर्वत श्रृंखलाओं के बीच सरयू, गोमती व विलुप्त सरस्वती नदी के संगम पर बसा है। पुराने समय से ही बागेश्वर को व्यापारिक मंडी के रूप में जाना जाता है। बागेश्वर में प्रतिवर्ष के बागनाथ मंदिर में ही प्रतिवर्ष विश्वप्रसिद्ध उत्तरायणी मेला भी लगता है।

प्राचीन समय में दारमा, व्यास, मुनस्यारी के निवासी भोटियों और साथ ही मैदान के व्यापारी भी इस मेले में आते थे। भेटिया जाति के लोग ऊन से बने वस्त्रों और जड़ी-बूटियों को बेचते थे और उसके बदले में अनाज व नमक इत्यादि जरूरत का सामान यहां से ले जाया करते थे। इसी कारण वर्तमान में नुमाइश मैदान कहे जाने वाले स्थान को पहले दारमा पड़ाव व स्वास्थ्य केन्द्र वाले स्थान को भोटिया पड़ाव कहा जाता था।

बागेश्वर के संगम पर हमेशा ही स्नान पर्व चलते रहता है। अयोध्या में बहने वाली सरयू और बागेश्वर की सरयू नदी एक ही मानी जाती है। सरमूल से निकलकर बागेश्वर से बहते हुए पिथौरागढ़ तक इसे सरयू उसके आगे टनकपुर तक इसे रामगंगा तथा टनकपुर से आगे इसे शारदा नाम से जाना जाता है। तथा अयोध्या में इसे पुन: सरयू नाम से पुकारा जाता है।

बागेश्वर का जिग्र स्कन्द पुराण के मानस खंड में भी किया गया है। इसके अनुसार बागेश्वर की उत्पत्ति आठवीं सदी के आस-पास की मानी जाती है। और यहां के बागनाथ मंदिर की स्थापना को तेरहवीं शताब्दी का बताया जाता है।


1955 तक बागेश्वर ग्राम सभा में आता था। 1955 में इसे टाउन ऐरिया माना गया। सन् 62 में इसे नोटिफाइड ऐरिया व 1968 में नगरपालिका के रूप में पहचान मिली। 1997 में इसे जनपद बना दिया गया।

स्वतंत्रता संग्राम में भी बागेश्वर का महत्वपूर्ण स्थान है। कुली बेगार आंदोलन की शुरुआत बागेश्वर से ही हुई थी। बागेश्वर अपने विभिन्न ग्लेशियरों के लिये भी विश्व में अलग स्थान रखता है। इन ग्लेशियरों के नाम है - सुंदरढु्रगा, कफनी और पिण्डारी ग्लेशियर






Thursday, June 17, 2010

कुमाउं में भी पाये जाते हैं भित्ती चित्र : लखु उडियार


प्रागेतिहासिक काल में मनुष्य ने अपने रहने के लिये उन गुफाओं को पसंद किया जो ऊँचे-ऊँचे स्थानों में तो स्थित होती ही थी साथ ही वहां से भोजन एवं जल की व्यवस्था भी आसानी से की जा सकती थी। उस समय के मानव ने इन गुफाओं में अपने रहन-सहन के अनुसार कुछ चित्रण भी किया जो कि आज भी कई गुफाओं में देखे जा सकते हैं।

कुमाउं में भी ऐसे कई स्थान हैं जहां इस तरह के भित्ती चित्र पाये जाते हैं। उनमें से ही एक जगह है लखु-उडि्यार। लखु उडियार अल्मोड़ा से कुछ दूरी पर स्थित है। जिस पहाड़ी में यह गुफा स्थित है उसके पास से ही सुयाल नदी होकर बहती है।    इस स्थान को मोटर मार्ग से भी आसानी से देखा जा सकता है। इस गुफा में में कई नर्तकों के चित्र बने हुए हैं। जिस रास्ते से अंदर जाते हैं उस जगह पर ही करीब 7 नर्तकों के चित्र अंकित हैं। और तो रहा और एक नर्तकों की मंडली में तो नर्तकों को आसानी से गिना भी जा सकता है। इन नर्तकों के बाद जो दूसरे प्रमुख चित्र इस गुफा में अंकित हैं वो हैं मानव का जानवरों को चराते हुए, शिकार करने के लिये उनका पीछा करते हुए। इसी तरह इस गुफा में कुछ और फिर चित्र अंकित हैं। जिनमें से कुछ तो आज भी स्पष्ट नजर आते हैं और कुछ खराब हो चुके हैं।

लखु-उडियार के पास और भी कई गुफायें हैं इसीलिये इस स्थान को लखु-उडियार कहा जाता है। लखु माने `लाख´ और उडियार का मतलब होता है `गुफा´। इन गुफाओं में भी कई तरह के चित्र अंकित हैं पर अब ये अच्छी हालत में नहीं हैं।
 

Monday, June 7, 2010

उत्तराखंड की महत्वपूर्ण परम्परा है भिटौली

 भिटौली शब्द भेंट से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ स्थानीय भाषा में मिलने से होता हैए जहां तक इस त्योहार का समबन्ध है तो इसमें शादीशुदा लड़्की के मायके वाले अपनी बहनध्बेटी को उसके ससुराल में जाकर भेंट ;यहां पर यह स्थानीय भाषा के अनुसार मिलने और उपहार देने दोनो अर्थों में हैद्ध या  भिटौली देते हैं। इस भेंट में मायके वालों की तरफ़ से पहले पिता ; अगर जीवित हैं तोद्ध इसे लेकर लड़की के घर जाते हैं तथा पिता की मृत्यु के बाद भाई इस कार्य को निभाते हैं। यह प्रथा इसलिये भी शुरु हुई होगी कि पहले आवागमन के सुगम साधन उपलब्ध नहीं थे और ना ही लड़की को मायके जाने की छूट। लड़की किसी निकट समबन्धी के शादी ब्याह या दुख बिमारी में ही अपने ससुराल से मायके जा पाती थी। इस प्रकार अपनी शादीशुदा लड़की से कम से कम साल में एक बार मिलने और उसको भेंट देने के प्रयोजन से ही यह त्यौहार बनाया गया होगा। भाई.बहन के प्यार को समर्पित यह त्यौहार ; रिवाज सिर्फ उत्तराखण्ड के लोगों के द्वारा मनाया जाता है। विवाहित बहनों को चैत का महिना आते ही अपने मायके से आने वाली  भिटौली की सौगात का इंतजार रहने लगता है।

शादी के बाद की पहली भिटौली लड़की को उसकी डोली विदाई के समय समय ही दी जाती हैए और उसके बाद जो पहला चैत का महीना होता है लड़की की शादी के वर्ष उसे काला महीना कहा जाता हैए लड़की उस महीने शादी के एक साल के अंदर पढ़ने वाले चैत के महीने में अपने मायके में ही रहती है। जिस कारण शादी के पहले वर्ष की भिटौली वैशाख में लड़की को ससुराल में विदा करते समय दी जाती है क्योंकि विवाह के पहले वर्ष के चैत्र को काला महीना माना जाता है फिर अगले वर्ष से जन्म पर्यंत भाई अपनी बहिन को हर वर्ष चैत्र के महीने में भिटौली देता है। चैत्र महीने की ५ गते तक विवाहित महिला को स्वयं तथा किसी और के द्वारा उसके सामने महीने का नाम लेना भी वर्जित होता है।

उत्तराखण्ड की हर विवाहित महिला चैत माह में अपने मायके वालों से भिटौली का इंतजार करती हैए जिसे पूरे गांव में बांटा जाता है। यह त्यौहार हमारे सामाजिक सदभाव का भी प्रतीक है। इस माह का महिलाओं के लिये कितना महत्व हैए हमारे लोकगीतों के माध्यम से सहज ही जाना जा सकता है। स्व० गोपाल बाबू गोस्वामी जी का यह गीत इसका प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत करता हैरू
 बासा घुघुती चैत की याद आ जैछे मैके मैत की

भिटौली से संबंधित कई कहानियां प्रचलित हैए जिसमें से एक प्रकार है कि
बहुत समय पहले किसी गांव में सचदेव नाम का लड़का रह्ता थाए उसकी बहिन का विवाह पाताल लोक में किसी नाग के साथ हुआ था। जब उसकी बहन का विवाह हुआ तब सचदेव बहुत छोटा था। जैसे जैसे सहदेव बड़ा हुआ और जब शादी के कई साल बीतने पर भी उसकी बहिन मायके नही आ पायी तो सचदेव को अपनी बहन की याद सताने लगी। और एक दिन वह उससे मिलने पाताल लोक चला गयाए लेकिन नाग ने सहदेव को पहले कभी देखा नही था। उन दोनों भाई बहनों को साथ देखकर वह उन दोनो के रिश्ते को शक की निगाह से देखने लगा। क्योंकि नाग सचदेव से कभी मिला नही थाए इसलिये उसने उन भाई बहनो के बारे में कुछ अपमानजनक बातें कही। ऐसी लज्जाजनक बातें सुन कर सचदेव को बड़ ग्लानि हुयी और उसने आत्महत्या कर ली। नाग को जब असलियत का पता चला तो उसने भी आत्महत्या कर ली। अपने भाई व पति के देहान्त के उप्रान्त सचदेव की बहिन ने सोचा कि अब उसकी भी जिंदगी व्यर्थ है और उसने भी अपनी इहलीला समाप्त कर दी। इन दोनों भाई बहनो के त्याग और बलिदान को याद करते हुए त्यौहार आज भी प्रचलन में है

भिटौली के सम्बन्ध में एक और दंत कथा लोक कथा इस प्रकार की भी प्रचलित है
एक गाँव में नरिया और देबुली नाम के भाई - बहन रहते थे और दोनो भाई बहनों में बहुत प्यार था। जब देबुली १५ वर्ष की हुयी तो उसकी शादी हो गई जो उस समय के अनुसार शादी के लिए बहुत ज्यादा उम्र थी। देबुली की शादी के बाद भी दोनों भाई बहनों को ही एक दूसरे का विछोह सालता रहा। दोनों भाई बहन भिटौली के त्यार की प्रतीक्षा करने लगे। अंततः समय आने पर भिटौली के दिन नरिया भिटौली की टोकरी सर पर रख कर खुशी - खुशी बहन से मिलने चला। बहन देबुली बहुत दूर ब्याही गयी थी पैदल चलते - चलते नरिया शुक्रवार की रात को दीदी के गाँव पहुँच पाया। जब नरिया अपनी बहन देबुली के घर पहुंचा तो देबुली तब गहरी नींद में सोई थीए थका हुआ नरिया भी देबुली के पैर के पास सो गया। सुबह होने के पहले ही नरिया की नींद टूट गयी देबुली तब भी सोई थी और नींद में कोई सपना देख कर मुस्कुरा रही थी। अचानक नरिया को ध्यान आया कि सुबह शनिवार हो जायेगा और शनिवार को देबुली के घर ले कर आने के लिये उसकी ईजा ने मना कर रखा था। नरिया ने भिटौली की टोकरी दीदी के पैर के पास रख दी और उसे प्रणाम कर के वापस अपने गाँव चला गया। देबुली सपने में अपने भाई को भिटौली ले कर अपने घर आया हुआ देख रही थीए नींद खुलते ही पैर के पास भिटौली की टोकरी देख कर उसकी बांछें खिल गयीं। वह भाई से मिलने दौड़ती हुई बाहर गयी लेकिन भाई नहीं मिला। वह पूरी बात समझ गयी भाई से न मिल पाने के हादसे ने उसके प्राण ले लिये। कहते हैं देबुली मर कर घुघुती, उत्तराखण्ड में घुघुती चिड़िया को सभी जानते हैं, बन गयी और चैत के महीने में आज भी कुछ इस प्रकार गाती हैर
भै भुखो मैं सितीए भै भुखो मैं सिती

भिटौली आने पर घर में त्यौहार का माहौल हो जाता हैए क्योंकि हर घर में बहुऎं अपने मायके से आने वाली भिटौली का ईन्तजार करती हैं। घर में भिटौली के साथ आने वाले पकवानों को गांव-पडोस में बांटा जाता है और इस तरह यह त्यौहार सामाजिक सदभाव को भी बढ़ावा देता है। चैत्र मास के दौरान पहाडो में सामान्यतः खेतीबारी के कामों से भी लोगों को फुरसत रहती है। जिस कारण यह रिवाज अपने नाते-रिश्तेदारो से मिलने जुलने का और उनके हाल-चाल जानने का एक माध्यम बन जाता है।

आज से कुछ दशक पहले जब यातायात व संचार के माध्यम इतने नहीं थे उस समय की महिलाओं के लिये यह परंपरा बहुत महत्वपूर्ण थी। जब साल में एक बार मायके से उनके लिये पारंपरिक पकवानों की पोटली के साथ ही उपहार के तौर पर कपडे आदि आते थे। इसमें एक तथ्य और है कि जब तक किसी महिला को भिटौली नहीं मिलती तब तक उस महिला के सामने चैत महीने का नाम नहीं लिया जाता है तथा इसे अपशगुन माना जाता है। ऎसा होने पर वह महिला अपने पहने कपड़े फाड़ देती हैए ताकि उसका भाई जीवित रहे। पर यह सब परम्पराऎं अब केवल प्रतीकात्मक रूप में ही मौजूद रह गयी हैं।

समय बीतने के साथ.साथ इस परंपरा में कुछ बदलाव आ चुका है। इस रिवाज पर भी औपचारिकता और शहरीकरण ने गहरा प्रभाव छोडा हैए वर्तमान समय में अधिकतर लोग फ़ोन पर बात करके कोरियर से गिफ़्ट या मनी आर्डर से अपनी बहनों को रुपये भेज कर औपचारिकता पूरी कर देते हैं। आज यह त्योहार भाई-बहन के प्रेमभाव की बजाय आर्थिक हित साधने का तथा स्टेटस सिमबल ज्यादा बनता जा रहा है। लेकिन ग्रामीण इलाकों में आज भी प्रेमभाव व पारिवारिक सौहार्द के साथ भिटौली का खास महत्व बना हुआ है।

Thursday, April 29, 2010

उत्तराखंड का राज्यपुष्प ब्रह्मकमल



हालांकि इसका नाम ब्रह्मकमल है पर यह तालों या पानी के पास नहीं बल्कि ज़मीन में होता है। ब्रह्मकमल 3000-5000 मीटर की ऊँचाई में पाया जाता है। ब्रह्मकमल उत्तराखंड का राज्य पुष्प है। और इसकी भारत में लगभग 61 प्रजातियां पायी जाती हैं जिनमें से लगभग 58 तो अकेले हिमालयी इलाकों में ही होती हैं।

ब्रह्मककल का वानस्पतिक नाम सोसेरिया ओबोवेलाटा है। यह एसटेरेसी वंश का पौंधा है। इसका नाम स्वीडर के वैज्ञानिक डी सोसेरिया के नाम पर रखा गया था। ब्रह्मकमल को अलग-अगल जगहों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है जैसे उत्तरखंड में ब्रह्मकमल, हिमाचल में दूधाफूल, कश्मीर में गलगल और उत्तर-पश्चिमी भारत में बरगनडटोगेस नाम से इसे जाना जाता है।

ब्रह्मकमल भारत के उत्तराखंड, सिक्किम, अरूणाचल प्रदेश, कश्मीर में पाया जाता है। भारत के अलावा यह नेपाल, भूटान, म्यांमार, पाकिस्तान में भी पाया जाता है। उत्तराखंड में यह पिण्डारी, चिफला, रूपकुंड, हेमकुण्ड, ब्रजगंगा, फूलों की घाटी, केदारनाथ आदि जगहों में इसे आसानी से पाया जा सकता है।

इस फूल के कई औषधीय उपयोग भी किये जाते हैं। इस के राइज़ोम में एन्टिसेप्टिक होता है इसका उपयोग जले-कटे में उपयोग किया जाता है। यदि जानवरों को मूत्र संबंधी समस्या हो तो इसके फूल को जौ के आटे में मिलाकर उन्हें पिलाया जाता है। गर्मकपड़ों में डालकर रखने से यह कपड़ों में कीड़ों को नही लगने देता है। इस पुष्प का इस्तेमाल सर्दी-ज़ुकाम, हड्डी के दर्द आदि में भी किया जाता है। इस फूल की संगुध इतनी तीव्र होती है कि इल्का सा छू लेने भर से ही यह लम्बे समय तक महसूस की जा सकती है और कभी-कभी इस की महक से मदहोशी सी भी छाने लगती है।

इस फूल की धार्मिक मान्यता भी बहुत हैं। ब्रह्मकमल का अर्थ है ‘ब्रह्मा का कमल’। यह माँ नन्दा का प्रिय पुष्प है। इससे बुरी आत्माओं को भगाया जाता है। इसे नन्दाष्टमी के समय में तोड़ा जाता है और इसके तोड़ने के भी सख्त नियम होते हैं जिनका पालन किया जाना अनिवार्य होता है। यह फूल अगस्त के समय में खिलता है और सितम्बर-अक्टूबर के समय में इसमें फल बनने लगते हैं। इसका जीवन 5-6 माह का होता है।

Saturday, April 17, 2010

उत्तराखंड में मनाये जाने वाला प्रमुख त्यौहार है हरेला




उत्तराखंड में मनाये जाने वाले त्यौहारों में से एक प्रमुख त्यौहार हरेला भी है। इस त्यौहार को मुख्यतया कृषि के साथ जोड़ा जाता है।

हरेले को प्रतिवर्ष श्रावण मास के प्रथम दिन मनाया जाता है। इसे मनाने का विधि विधान बहुत दिलचस्प होता है। जिस दिन यह पर्व मनाया जाता है उससे 10 दिन पहले इसकी शुरूआत हो जाती है। इसके लिये सात प्रकार के अनाजों को जिसमें - जौ, गेहूं, मक्का, उड़द, सरसों, गहत और भट्ट (गहत और भट्ट पहाड़ों में होने वाली दालें हैं) के दानों को रिंगाल से बनी टोकरियों, लकड़ी से बने छोटे-छोटे बक्सों में या पत्तों से बने हुए दोनों में बोया जाता है।

हरेला बोने के लिये हरेले के बर्तनों में पहले मिट्टी की एक परत बिछायी जाती है जिसके उपर सारे बीजों को मिलाकर उन्हें डाला जाता है और इसके उपर फिर मिट्टी की परत बिछाते हैं और फिर बीज डालते हैं। यह क्रम 5-7 बार अपनाया जाता है। और इसके बाद इतने ही बार इसमें पानी डाला जाता है और इन बर्तनों को मंदिर के पास रख दिया जाता है। इन्हें सूर्य की रोशनी से भी बचा के रखा जाता है।

इन बर्तनों में नियमानुसार सुबह-शाम थोड़ा-थोड़ा पानी डाला जाता है। कुछ दिन के बाद ही बीजों में अंकुरण होने लगता है और फिर धीरे-धीरे ये बीज नन्हे-नन्हे पौंधों का रूप लेने लगते हैं। सूर्य की रोशनी न मिल पाने के कारण ये पौंधे पीले रंग के होते हैं। 9 दिनों में ये पौंधे काफी बड़े हो जाते हैं और 9वें दिन ही इन पौंधों को पाती (एक प्रकार का पहाड़ी पौंधा) से गोड़ा जाता है। ऐसा माना जाता है कि जिसके पौंधे जितने अच्छे होते हैं उसके घर में उस वर्ष फसल भी उतनी ही अच्छी होती है।

10 वें दिन इन पौंधों को उसी स्थान पर काटा जाता है। काटने के बाद हरेले को सबसे पहले पूरे वििध - विधान के साथ भगवान को अर्पण किया जाता है। उसके बाद परिवार का मुखिया या परिवार की मुख्य स्त्री हरेले के तिनकों को सभी परिवारजनों के पैरों से लगाती हुई सर तक लाती है और फिर सर या कान में हरेले के तिनकों को रख देती है। हरेला रखते समय आशीष के रूप में यह लाइनें कही जाती हैं -
लाग हरियाव, लाग दसें, लाग बगवाल,
जी रये, जागी रये, धरति जतुक चाकव है जये,
अगासक तार है जये, स्यों कस तराण हो,
स्याव कस बुद्धि हो, दुब जस पंगुरिये,
सिल पियी भात खाये

अथाZत - हरेला पर्व आपके लिये शुभ हो, जीते रहो, आप हमेशा सजग रहो, पृथ्वी के समान र्धर्यवान बनो, आकाश के समान विशाल होओ, सिंह के समान बलशाली बनो, सियार के जैसे कुशाग्र बुद्धि वाले बनो, दूब घास के समान खूब फैलो और इतने दीघाZयु होओ कि दंतहीन होने के कारण तुम्हे सिल में पिसा भात खाने को मिले।

जो लोग उस दिन अपने परिवार के साथ नहीं होते हैं उन्हें हरेले के तिनके पोस्ट द्वारा या किसी के हाथों भिजवाये जाते हैं। कुमाऊँ में यह त्यौहार आज भी पूरे रीति-रिवाज और उत्साह के साथ मनाया जाता है।



Tuesday, April 13, 2010

ऐसा होता है पत्थर मारने वाला मेला


कुमाउं के देवीधुरा स्थान में रक्षा बंधन के दिन पत्थर मारने वाला एक मेला मनाया जाता है जिसे बग्वाल कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि देवीधुरा के लोग बावन हजार चौसठ योगनियों के आतंक से बहुत दु%खी रहते थे। उन्होंने मिल कर माँ वाराही से प्रार्थना की कि वह उनको इनसे छुटकारा दिलवायें। माँ ने भी भक्तों की फरियाद सुनी और उन्हें इस आतंक से छुटकारा दिलाया और साथ ही देवी माँ ने मांग की कि प्रतिवर्ष श्रावणी पूर्निमा के दिन पत्थरों की मार से एक व्यक्ति के बराबर रक्त निकले जिससे उन्हें तृप्त किया जाये। तभी से हर वर्ष माँ को खुश करने के लिये इस पत्थर मार मेले के आयोजन किया जाता है। 

बगवाल परंपरा का निर्वाह करने वाले महर और र्फत्याल जाति के लोग हैं। इनकी अपनी अलग-अलग टोलियाँ होती हैं जो ढोल-नगाड़ों के साथ मंदिर के प्रांगड़ में पहुँचती है। इनके सर पर कपड़ा, हाथ में लट्ठ और एक ढाल होती है जिसे छन्तोली कहते हैं। इसमें भाग लेने वालों को पहले दिन से ही सातविक व्यवहार करना होता है। देवी की पूजा का दायित्व विभिन्न जातियों का है। फुलारा कोट के फुलारा मंदिर में फूलों की व्यवस्था करवाते हैं। मनटांडे और ढोलीगाँव के ब्राहम्ण श्रावण की एकादशी के अतिरिक्त सभी पर्वों पर पूजन करवा सकते हैं। भैसिरगाँव के गहड़वाल राजपूत बलि के भैंसों पर पहला प्रहार करते हैं।

बगवाल का एक निश्चित विधान होता है। मेले की पूजा अर्चना लगभग आषाढ़ि कौतिक के रूप में एक माह तक चलती है। बगवाल के लिये एक प्रकार का सांगी पूजन एक विशिष्ठ प्रक्रिया के साथ सम्पन्न किया जाता है जिसे परम्परागत रूप से पूर्व से ही संबंधित चारों खाम गहड़वाल, चम्याल, बालिक और लमगड़िया के द्वारा सम्पन्न किया जाता है। मंदिर में रखा देवी विग्रह एक संदूक में बंद रहता है जिसके सामने यह पूजन होता है। यह लमगड़िया खाम के प्रमुख को सौंप दिया जाता है क्योंकि उन्होंने ही प्राचीन काल में रोहिलों के हाथ से देवी विग्रह को बचाया था। इस बीच अठवार का पूजन भी होता है जिसमें सात बकरे और एक भैंस की बलि दी जाती है। पूजा से पूर्व देवी के मूर्ति को संदूक से बाहर निकाल कर स्नान कराया जाता है जिससे लिये पूजारी की आंखों में पहले पट्टी बांध दी जाती है। ऐसा इसलिये करते हैं क्योंकि मूर्ति को निर्वस्त्र देखना अच्छा नहीं समझा जाता है।


श्रावणी पूर्णिमा को देवी विग्रह का डोला मंदिर के प्रांगण में रखा जाता है और चारों खामों के मुखिया इसका पूजन करते हैं। बगवाल युद्ध में भाग लेने वालों को `द्योके´ कहा जाता है। जिन्हें महिलायें आरती उतार कर और पत्थर हाथ में देकर ढोल नगाड़ों के साथ युद्ध के लिये भेजती हैं। चारों खामों के योद्धाओं के मार्ग पहले से ही सुनिश्चित कर दिये जाते हैं। मैदान में पहुंचने के स्थान व दिशा चारों खामों की अलग-अलग होती है। लमगड़िया खाम उत्तर की ओर से, चम्याल खाम दक्षिण की ओर से, बालिक पश्चिम से और गहड़वाल खाम पूर्व की ओर से मैदान में आते हैं।

दोपहर तक चारों खाम देवी के मंदिर के उत्तरी द्वार से प्रवेश करती हुई परिक्रमा करती है और मंदिर के पश्चिम द्वार से बाहर निकल जाती है। फिर मंदिर के प्रांगण में अपना-अपना स्थान घेरने लगते हैं। दोपहर में जब सारी भीड़ इकट्ठा हो जाती है तो मंदिर के मुख्य पुजारी बगवाल शुरू करने की घोषणा करते है। इसके साथ ही चारों खामों के मुखियाओं की अगुवाई में पत्थरों की वर्षा शुरू हो जाती है। जैसे युद्ध अपने चरम पर पहुँचता है ढोल नगाड़ों के स्वर भी ऊंचे हो जाते हैं। प्रत्येक दल के लोग अपनी-अपनी छन्तोली से अपनी सुरक्षा करते हैं। इस बीच जब मुख्य पुजारी को जब यह अहसास हो जाता है कि एक नर के जितना रक्त बह गया होगा तो वह मैदान के बीच में जाकर बगवाल के समाप्त होने की घोषणा करते हैं और उनकी घोषणा के बाद युद्ध को समाप्त मान लिया जाता है। युद्ध समाप्त होने के बाद चारों खामों के लोग आपस में गले मिलते हैं। और प्रांगण से विदा होने लगते हैं। उसके बाद मंदिर में पूजा होती है। ऐसा कहा जाता है कि इस पत्थर वर्षा में जो लोग घायल होते हैं उनका इलाज मंदिर परिसर में पायी जाने वाली बिच्छू घास से किया जाता है। इसे लगाने के बाद घाव शीघ्र भर जाते हैं।

पहले जो बगवाल होती थी उसमें छन्तोली ¼छत्री½ का प्रयोग नहीं किया जाता था परन्तु सन् 1945 के बाद से इनका प्रयोग किया जाने लगा। बगवाल में निशाना साध कर पत्थर मारना पाप माना जाता है। दूसरे दिन संदूक में रखे देवी विग्रह की डोले के रूप में शोभायात्रा निकाली जाती है। और इस तरह बगवाल मेला सम्पन्न हो जाता है।

Friday, April 9, 2010

उत्तराखंड की लोक संस्कृति है जागर

कुमाउंनी संस्कृति के विविध रंग हैं जिनमें से एक है यहां की ‘जागर’। उत्तराखंड में ग्वेल, गंगानाथ, हरू, सैम, भोलानाथ, कलविष्ट आदि लोक देवता हैं और जब पूजा के रूप में इन देवताओं की गाथाओं का गान किया जाता है उसे जागर कहते हैं। जागर का अर्थ है ‘जगाने वाला’ और जिस व्यक्ति द्वारा इन देवताओं की शक्तियों को जगाया जाता है उसे ‘जगरिया’ कहते हैं। इसी जगरिये के द्वारा ईश्वरीय बोल बोले जाते हैं। जागर उस व्यक्ति के घर पर करते हैं जो किसी देवी-देवता के लिये जागर करवा रहा हो।

जागर में सबसे ज्यादा जरूरी होता है जगरिया। जगरिया को ही हुड़का और ढोलक आदि वाद्य यंत्रों की सहायता से देवताओं का आह्वान करना होता है। जगरिया देवताओं का आह्वान किसी व्यक्ति विशेष के शरीर में करता है। जगरिये को गुरू गोरखनाथ का प्रतिनिधि माना जाता है। जगरिये अपनी सहायता के लिये दो-तीन लोगों को और रखते हैं। जो कांसे की थाली को लकड़ियों की सहायता से बजाता है। इसे ‘भग्यार’ कहा जाता है।

जागर में देवताओं का आह्वान करके उन्हें जिनके शरीर में बुलाया जाता है उन्हें ‘डंगरिया’ कहते हैं। ढंगरिये स्त्री और पुरूष दोनों हो सकते हैं। देवता के आह्वान के बाद उन्हें उनके स्थान पर बैठने को कहा जाता है और फिर उनकी आरती उतारी जाती है। जिस स्थान पर जागर होनी होती है उसे भी झाड़-पोछ के साफ किया जाता है। जगरियों और भग्यारों को भी भी डंगरिये के निकट ही बैठाया जाता है।

जागर का आरंभ पंच नाम देवों की आरती द्वारा किया जाता है। शाम के समय जागर में महाभारत का कोई भी आख्यान प्रस्तुत किया जाता है और उसके बाद जिन देवी-देवताओं का आह्वान करना होता है उनकी गाथायें जगरियों द्वारा गायी जाती हैं। जगरिये के गायन से डंगरिये का शरीर धीरे-धीरे झूमने लगता हैं। जागर भी अपने स्वरों को बढ़ाने लगता है और इसी क्षण डंगरिये के शरीर में देवी-देवता आ जाते हैं। जगरिये द्वारा फिर से इन देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। अब डंगरिये नाचने लगते हैं और नाचते-नाचते अपने आसन में बैठ जाते हैं। डंगरिया जगरिये को भी प्रणाम करता है। डंगरिये के समीप चाल के दाने रख दिये जाते हैं जिन्हें हाथों में लेकर डंगरिये भूतकाल, भविष्यकाल और वर्तमान के विषय में सभी बातें बताने लगते हैं।

डंगरिये से सवाल पूछने का काम उस घर के व्यक्ति करते हैं जिस घर में जागर लगायी जाती है। बाहरी व्यक्ति भी अपने सवाल इन डंगरियों से पूछते हैं। डंगरिये द्वारा सभी सवालों के जवाब दिये जाते हैं और यदि घर में किसी तरह का कष्ट है तो उसके निवारण का तरीका भी डंगरिये द्वारा ही बताया जाता है। जागर के अंत में जगरिया इन डंगरियों को कैलाश पर्वत की तरफ प्रस्थान करने को कहता है। और डंगरिया धीरे-धीरे नाचना बंद कर देता है।

जागर का आयोजन ज्यादातर चैत्र, आसाढ़, मार्गशीर्ष महीनों में किया जाता है। जागर एक, तीन और पांच रात्रि तक चलती है। सामुहिक रूप से करने पर जागर 22 दिन तक चलती है जिसे ‘बाईसी’ कहा जाता है।

वैसे तो आधुनिक युग के अनुसार इन सबको अंधविश्वास ही कहा जायेगा। पर ग्रामीण इलाकों में यह परम्परा आज भी जीवित है और लोगों का मानना है कि जागर लगाने से बहुत से लोगों के कष्ट दूर हुए हैं। उन लोगों के इस अटूट विश्वास को देखते हुए इन परम्पराओं पर विश्वास करने का मन तो होता ही है।

Thursday, April 1, 2010

ऐसा है रुद्रपुर का इतिहास

 
अतरिया देवी का मंदिर

रुद्रपुर का निर्माण चन्द वंश के राजा रुद्र चन्द ने (1565-1597) में किया। कुमाउं में 16वीं सदी में इनका ही शासन था। एक दंत कथा के अनुसार एक बार जब राजा रुद्र चन्द यहाँ से जा रहे थे तो उनके रथ का पहिया दलदली जमीन में फंस गया। उसके बाद उन्होंने इस जगह पर एक मंदिर और एक कुंए का निर्माण करवाया। यह मंदिर आज भी अतरिया देवी मंदिर के नाम से इस स्थान पर है। जो कि बस स्टैंड से 2 किमी. दूर है। हर वर्ष नवरात्र में यहां 10 दिन का मेला लगता है।

आज के रुद्रपुर को 1960 में बसाया गया था। इसे बसाने का मुख्य कारण था बटवारे के दौरान पाकिस्तान, बर्मा, बांग्लादेश, पश्चिमी पंजाब से आये शरणार्थियों को रहने के लिये जगह देना। उस समय के मुख्यमंत्री भारत रत्न गोविन्द बल्लभ पंत द्वारा यहां शरणार्थियों को बसाया गया तब उत्तराखंड उत्तर प्रदेश का हिस्सा था। शासन ने जमीन के छोटे-छोटे टुकड़े इन शरणार्थियों को दे दिये ताकि वो इसमें अपना घर बना सके और खेती कर सकें।

इस तरह से बसा यह छोटा सा शहर अब काफी फैल चुका है और उत्तराखंड के कृषि में सबसे अहम योगदान दे रहा है। रुद्रपुर अपने यहां पैदा होने वाले चावलों के लिये भी जाना जाता है। आज भी रुद्रपुर की लगभग 70 प्रतिशत आबादी कृषि कार्यों से जुड़ी हुई है।

Monday, March 29, 2010

काशीपुर पर कवि गुमानी की कविता

मैंने अपनी पिछली पोस्ट में काशीपुर के इतिहास के बारे में लिखा था। कुमाऊं के प्रसिद्ध कवि गुमानी यहीं पैदा होते थे। सिद्धेश्वर जी के कहने पर मैं गुमानी जी की काशीपुर पर लिखी रचना यहां लगा रही हूं।

कथावाले सस्ते किरत धर पोथी बगल में।
लई थैली गोली घर-घर हसीमी सब करै।।

रंगीला-सा पत्रा कर शरत जोशी सब बनै।
अजब देखा काशीपुर शहर सारे जगत में।।

यहाँ ढेला नहीं उत बहत गंगा निकट में।
यहाँ भोला मोटेश्वर बहत विश्वेश्वर वहाँ।।

यहाँ संडे दंडे कर धर फिरें साँड उत्तही।
परक क्या है काशीपुर शहर काशीनगर में।।

Tuesday, March 23, 2010

ऐसा है काशीपुर का इतिहास

काशीपुर उत्तराखंड का तराई वाला शहर है। काशीपुर का इतिहास भी बिल्कुल अनोखा है।

काशीपुर को हर्ष के समय (606-641 ए.डी.) में गोविषाण नाम से जाना जाता था। लगभग इसी समय में यहाँ चीनी यात्री ह्वेनसांग भी आया था। इस जगह का नाम काशीपुर, चन्द राजा काशीनाथ अधिकारी के नाम पर पड़ा। जिन्होंने इसे 16-17वीं शताब्दी में बसाया था। काशीपुर चन्द राजाओं का निवास स्थल रही है। कुमाऊँ के प्रसिद्ध कवि गुमानी की जन्मस्थली भी काशीपुर ही रही।
 
काशीपुर के पुराने किले को उज्जैन कहा जाता है। उज्जैन किले की दीवारें 60 फुट ऊँची है और इसमें इस्तेमाल हुई ईंटें 15x10x2.5 इंच की हैं। इस किले में उज्जैनी देवी की मूर्ति स्थापित है। यहाँ चैत माह में चैती का मेला लगता है।  इसके पास द्रोण सागर है। ऐसी मान्यता है कि इस सागर को पाण्डवों ने अपने गुरू द्रोणाचार्य को गुरूदक्षिणा के रूप में देने के लिये बनाया था। यह 600 वर्ग फुट का है। इसके किनारे कई देवी-देवताओं के मंदिर हैं। द्रोणसागर को अब आर्कियोलॉजिकल डिपार्टमेंट का संरक्षण प्राप्त है।

इसके पास मोतेश्वर महादेव का मंदिर है। इसे शिव के बारह ज्यार्तिलिंगों में से एक माना जाता है। इसके पास में ही जागेश्वर महादेव को मंदिर भी है जो 20 फुट ऊँचा है। काशीपुर का सबसे प्रसिद्ध मंदिर है बाल सुन्दरी का, जिसे चैती देवी के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ नवरात्रियों में मेला लगता है। इस मंदिर का शिल्प मस्जिद के समान है जिससे यह पता लगता है कि इसे शायद मुगल साम्राज्य के समय में बनाया गया होगा।



चैती देवी का मंदिर



Wednesday, March 17, 2010

औली के बारे में कुछ

औली उत्तराखण्ड का एक भाग है। यह 5-7 किमी. में फैला छोटा-सा स्की रिसोर्ट है। इस रिसोर्ट को 9,500-10,500 फीट की ऊंचाई पर बनाया गया है। यहां बर्फ से ढकी चोटियां बहुत ही सुन्दर दिखाई देती हैं। इनकी ऊंचाई लगभग 23,000 फीट है। यहां पर देवदार के वृक्ष बहुतायत में पाए जाते हैं।

औली में प्रकृति ने अपने सौन्दर्य को खुल कर बिखेरा है। यात्रा करते समय आपको गहरी ढ़लानों और ऊंची चढाई चढ़नी पड़तीं है। यहां पर सबसे गहरी ढलान 1,640 फुट पर और सबसे ऊंची चढा़ई 2,620 फुट पर है। यहां पर केवल स्किंग और केवल स्किंग की जा सकती है। इसके अलावा यहां पर अनेक सुन्दर दृश्यों का आनंद भी लिया जा सकता है। नंदा देवी के पीछे सूर्योदय देखना एक बहुत ही सुखद अनुभव है। नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान यहां से 41 किमी. दूर है।

यहां पर स्की करना सिखाया जाता है। गढ़वाल मण्डल विकास निगम ने यहां स्की सिखाने की व्यवस्था की है। यह ट्रेनिंग हर वर्ष जनवरी-मार्च में दी जाती है। मण्डल के अलावा निजी संस्थान भी ट्रेनिंग देते हैं।

औली की यह तस्वीरें मुझे ताउजी ने मेल से भेजी थी। जिन्हें उन्होंने अपनी औली यात्रा के दौरान स्वयं लिया है।












Saturday, February 6, 2010

22 अक्टूबर 2019 में हो जायेंगे 100 साल पूरे

यह मेरे ब्लॉग की भी 100 वीं पोस्ट है।

भारत में मद्रा के स्वरूप में हमेशा ही बदलाव होता रहा है। पहले जो मुद्रा प्रचलन में थी वो इस समय के प्रचलित मुद्रा से बिल्कुल अलग थी। ऐसी ही एक मुद्रा मुझे देखने को मिली तो मेरे लिये किसी अजूबे से कम नहीं थी।

यह दस रुपय का नोट है जो 22 अक्टूबर 1919 के समय में प्रचलन में था और 2019 में अपने सौ वर्ष पूरे करेगा। उस समय के 10 रुपये इस समय के 10 रुपये से बिल्कुल ही अलग थे।

 यह 21.2 सेमी. लम्बा और 13 सेमी. चौड़ा है। 

इसमें एक ही तरफ छपाई है। 


इसमें कलर प्रििन्टंग है

इसमें 9 भाषाओं का इस्तेमाल हुआ है। 

इसमें वॉटर मार्क से अंग्रेज़ी में टैन लिखा हुआ है। 

इसमें इस्तेमाल कागज़ आज लगभग 100 साल में भी सही सलामत है।

यह मुद्रा मुझे नैनीताल निवासी श्री राजेन्द्र लाल साह जी द्वारा मिली। राजेन्द्र जी नैनीताल के रंगकर्मी एवं कुमाउंनी होली गायक हैं। उन्हें यह उनके दादा जी स्व. श्री दास साह जी द्वारा प्राप्त इुई जिसे उन्होंने आज तक भी सम्भाल कर रखा है।

Friday, January 22, 2010

रानीबाग की कुछ तस्वीरें इस पोस्ट में

पिछली पोस्ट में मैंने रानीबाग में लगने वाले उत्तरायणी मेले के बारे में लिखा था पर कुछ समस्याओं के कारण तस्वीरें नहीं लगा पाई थी। इस पोस्ट में रानीबाग की कुछ तस्वीरें लगा रही हूं।


रानीबाग का मुख्य मन्दिर


 
जिया रानी की गुफा को जाने वाला रास्ता



जिया रानी की गुफा
 


 
जियारानी का मुख्य मन्दिर



नदी के किनारे लगे श्रृद्धालुओं की भीड़


जिया रानी का वो पत्थर जिसमें उनके घाघरे के निशान आज भी हैं


तट पर पूजा कराते श्रद्धालु


रानीबाग में लगी दुकानें

Tuesday, January 19, 2010

रानीबाग का उत्तरायणी मेला


इस बार 14 जनवरी मकर संक्रान्ति या उत्तरायणी वाले दिन रानीबाग जाने का अवसर मिला जो मेरे लिये इस दुनिया का सबसे पवित्र स्थान है। रानीबाग नैनीताल से 28 किमी. की दूरी पर है। रानीबाग में ही एच.एम.टी. घड़ी की फैक्ट्री भी है जिसने पहाड़ वालों को बहुत लम्बे समय तक रोजगार उपलब्ध करवाया और बाद में सरकार और कर्मचारी दोनों की लापरवाहियों के चलते बन्द भी हो गई।

रानीबाग में चित्रेश्वर महादेव का मन्दिर है जो कत्यूरियों के समय का है। उत्तराखण्ड में कत्यूरवंशियों ने बहुत लम्बे समय तक शासन किया। इसलिये इसे चित्रशिला तीर्थ के नाम से जाना जाता है। यहां एक नदी भी बहती है जिसके किनारे हिन्दुओं का शमशान घाट है और एसी मान्यता है कि इस जगह का महात्म्य हरिद्वार जितना ही है।

रानीबाग में मकर संक्रान्ति के अवसर पर मेला लगता है। इस मेले की खास बात है इसमें लगने वाली जागर। इस जागर में कुमाउं और गढ़वाल के कत्यूर वंशी आते हैं और मां जियारानी के पत्थर के सामने एकत्रित होकर जागर लगाते हैं और अपनी कुलदेवी जियारानी को याद करते हैं।

कहा जाता है कि मां जिया इसी स्थान पर चित्रेश्वर महादेव की अराधना किया करती थी और पास ही में बनी गुफा में रहती थी। एक बार जब वो स्नान कर कर रही थी उसी समय उन पर उनके शत्रुओं द्वारा उन पर हमला कर दिया गया। अपनी रक्षा के लिये लिये जियारानी अपनी गुफा में चली गई और उसके बाद वो गायब हो गई। कहा जाता है कि नदी के किनारे एक पत्थर में उनके घाघरे के निशान आज भी हैं और इसी पत्थर के चारों ओर कत्यूर वंशियों द्वारा हर साल जागर लगायी जाती है। इस जागर में कत्यूरवंशी 13 तारीख से आने लगते हैं और रात से ही अपनी कुलदेवी की याद में जागर लगाने लगते हैं। जियारानी को जागरों की महारानी भी कहा जाता है।

इस स्थान पर अब कुछ नये मन्दिर भी बना दिये गये हैं और चित्रेश्वर महादेव और जियारानी की गुफा को आधुनिक ढंग का बना दिया गया है जिस कारण इन मन्दिरों की प्राचीनता कम हो गई है। जागर के अलावा इस स्थान पर श्रद्धालुओं द्वारा विभिन्न तरह की पूजायें और यज्ञोपवीत संस्कार इत्यादि भी किये जाते हैं। मन्दिर परिसर के अन्दर एक छोटे से मेले का आयोजन भी होता है जिसमें आसापास के स्थानों  से व्यापारी आकर दुकानें लगाते हैं।

कुछ तकनीकि समस्याओं के चलते इस पोस्ट में फोटो नहीं लगा पा रही हूं। फोटो अगली पोस्ट में।


Tuesday, November 24, 2009

कस्तूरी मृग : उत्तराखंड का राजकीय पशु



कस्तूरी मृग जिसे अंग्रेजी में मस्क डियर भी कहते हैं उत्तराखंड का राजकीय पशु है। कस्तूरी मृग में पाये जाने वाली कस्तूरी के कारण इसकी विशेष पहचान है पर इसकी यही विशेषता इसके लिये अभिशाप भी है। कस्तूरी मृग हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाता है। उत्तराखंड के अलावा यह नेपाल, चीन, तिब्बत, मंगोलिया, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, भूटान, वर्मा, कोरिया एवं रुस आदि देशों में भी पाया जाता है।

कस्तूरी मृग से मिलने वाले कस्तूरी की अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार में कीमत लगभग 30 लाख रुपया प्रतिकिलो है जिसके कारण इसका अवैध शिकार किया जा रहा है। चीन 200 किलो के लगभग कस्तूरी का निर्यात करता  है। आयुर्वेद में कस्तूरी से टी.बी., मिर्गी, हृदय संबंधी बिमारियां, आर्थराइटिस जैसी कई बिमारियों का इलाज किया जा सकता है। आयुर्वेद के अलावा यूनानी और तिब्बती औषधी विज्ञान में भी कस्तूरी का इस्तेमाल बहुत ज्यादा किया जाता है। इसके अलावा इससे बनने वाली परफ्यूम के लिये भी इसकी बहुत मांग है।

कस्तूरी चॉकलेट रंग की होती है जो एक थैली के अंदर द्रव रूप में पायी जाती है। इसे निकाल कर सुखाकर इस्तेमाल किया जाता है। एक मृग से लगभग 30-40 ग्राम तक कस्तूरी मिलती है और कस्तूरी सिर्फ नर में ही पायी जाती है जबकि इसके लिये मादा मृगों का भी शिकार किया जाता है। जिस कारण इनकी संख्या में बहुत ज्यादा कमी आ गयी है।

कस्तूरी निकालने के लिये इन जानवरों का शिकार करना बिल्कुल भी जरूरी नहीं है क्योंकि कुछ आसान तकनीकों का इस्तेमाल करके इनसे कस्तूरी को आसानी से बिना मारे निकाला जा सकता है।

इसके जीवन पर पैदा हो रहे संकट के चलते इसे `इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजरवेशन ऑफ नेचर एंड नेचुरल रिसोर्सेस´ ने `रैड डाटा बुक´ में शामिल किया गया है। भारत सरकार ने भी वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट के तहत इसके शिकार को गैरकानूनी घाषित कर दिया है। इंडियन वाइल्ड लाइफ बोर्ड ने जिन 13 वन्य प्राणियों के जीवन को खतरे की सूची में डाला है उसमें से कस्तूरी मृग भी एक है।

यदि अभी भी इस जानवर को बचाने के प्रयास गंभीरता से नहीं किये गये तो जल्द ही उत्तराखंड का यह राजकीय पशु शायद सिर्फ तस्वीरों में ही नज़र आयेगा।